– दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा विभाग को लगता है कि उसके नियमों का अक्षरश: पालन होगा। प्राध्यापकों के लिए 7 घंटे का शिफ्ट तो हो जाएगा। नौकरी करनी है तो इतना तो करना ही होगा। पर एक सत्र में विद्यार्थियों की सात बार परीक्षा लेनी होगी। 75 फीसदी अटेंडेंस सुनिश्चित करने के लिए साल में दो बार अटेंडेंस की समीक्षा की जाएगी। पहले मूल्यांकन में शार्ट अटेंडेंट्स मिलने पर दूसरे मूल्यांकन तक विद्यार्थी को 100 फीसद हाजिरी भरनी होगी। सरकारी कालेजों में तो फिर भी बच्चे आते हैं पर निजी महाविद्यालयों में एडमिशन तो होता ही इन शर्तों पर है कि अटेंडेंस की चिंता कालेज कर लेगा। इनमें से कुछ के पास तो बिल्डिंग और फर्नीचर तक नहीं है। ऐसे कालेज कोचिंग संस्थानों के साथ सेटिंग करते हैं। कोचिंग संस्थानों के बच्चे इन कालेजों में नाम लिखवा लेते हैं। कोचिंग और कालेज का समय एक ही है, इसलिए कालेज जाना उनका हो नहीं पाता। कालेज उन्हें हाजिरी दे देते हैं और ये प्राइवेट स्टूडेंट फर्जी तरीके से रेगुलर हो जाते हैं। अधिकांश कालेज गुपचुप ढंग से ऐसा करते हैं पर एक कालेज ने तो इसका विज्ञापन ही सोशल मीडिया पर जारी कर दिया। इसके पाम्पलेट भी बंटवा दिये। जब मामला विश्वविद्यालय के संज्ञान में आया तो कुलपति ने भरी बैठक में कालेज की खूब खबर ली। इसके साथ ही बात आई गई हो गई। दरअसल, कालेजों का एकमात्र आकर्षण, रेगुलर विद्यार्थी के रूप में डिग्री हासिल करना है। प्राइवेट-रेगुलर का फर्क मिटा दें तो अधिकांश कालेज खाली रह जाएंगे। छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा ढर्रे पर है। प्राइवेट वाला बच्चा घर में बैठकर गाइड को दो दिन में पढ़ता है और रेगुलर स्टूडेंट को वही गाइड 10 महीने में खींच-तान कर पढ़ाया जाता है। न पाठ्यक्रम में कोई बदलाव होता है, न प्रश्न पत्र में। गाईड, कोचिंग और विश्वविद्यालय के बीच गजब का भाईचारा है। इनके गठजोड़ को तोड़े बिना कालेजों को अध्ययन केन्द्र बनाना मुश्किल ही नहीं, असंभव है। पाठ्यपुस्तकों की बिक्री का आंकड़ा देख ले उच्च शिक्षा विभाग तो बात समझ में आ जाएगी।
बात का बतंगड़: उच्च शिक्षा विभाग की खामख्याली




