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गुस्ताखी माफ: 700 किलोमीटर दूर से देखा सुईसाइड

By Om Prakash Verma
Published: November 3, 2022
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
इंदौर में एक महिला अपने कमरे में फांसी लगा रही थी और उसका पति भिलाई में बैठा यह दृश्य अपने मोबाइल पर देख रहा था. वह देख रहा था पर लाचार था, इतनी दूर से वह कर भी क्या सकता था. उसने पड़ोसी को फोन लगाया पर जब तक वह दरवाजा तोड़कर भीतर जाता, महिला की मौत हो चुकी थी. इस घटना का एक स्याह पहलू और है. कुछ समय पहले तक पूरा परिवार इंदौर में ही रहता था. बीसी और फंडिंग रैकेट में उलझना इन्हें महंगा पड़ गया. बीसी खिलाने वाले ने धोखा दिया तो वो लोग छाती पर चढ़ गए, जिन्होंने इनके कहने पर पैसा लगाया था. जब बीसी और फंडिंग में लगा पैसा अटक गया तो निवेश करने वाले धमकियां देने लगे. कुछ लोगों ने घर पर हमला भी किया. बड़ी बीसियों का अंत अकसर ऐसे ही होता है. गली मोहल्लों की छोटी बीसियों में भी मनमुटाव होता है और कल तक के दोस्त एक दूसरे की जान के दुश्मन बन जाते हैं. पर इसके बाद महिला ने जो किया उसकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता. महिला ने इस पूरे झमेले की जिम्मेदारी स्वयं ले ली और पति और बेटी को सुरक्षित भिलाई भेज दिया. जबकि ऐसे संकटकाल में आम तौर पर होता यही है कि पति सामने आ जाता है और पत्नी-बेटी को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर देता है. पर इस मामले में ऐन उलटा हुआ. इसे समझने के लिए आधुनिक मनोवृत्ति को समझना होगा. बैंकिंग सेक्टर ने चाहे जितनी तरक्की कर ली है पर उसका आकर्षण खत्म हो चुका है. सेफ इंवेस्टमेंट के चक्कर में सरकारी बैंक आम आदमी के किसी काम के नहीं रहे. वो केवल सरकारी वेतन पाने वालों पर मेहरबान हैं. शेष आबादी निजी बैंकों के भरोसे हैं. यहां ब्याज दर ऊंचा हो सकता है पर जरूरत पडऩे पर ऋण मिल जाता है. जिन सूदखोरों से लोगों को बचाने बैंकों की स्थापना की गई थी, वह भी अब रूप बदलकर सामने आ गए हैं. इन्होंने अपना-अपना कार्यक्षेत्र बांट रखा है. कोई सिर्फ वाहन फाइनेंस करता है तो कोई मकान. मोबाइल फोन से लेकर राशन, कपड़े, जूते तक का बड़ा बाजार अब ईएमआई पर आ टिका है. फिर भी कुछ जरूरतें ऐसी होती हैं जिनके लिए कोई भी फायनेंस उपलब्ध नहीं है. फाइनेंस कंपनियां इन जरूरतों के लिए पर्सनल लोन देती हैं. पर्सनल लोन पर ब्याज दरें सूदखोरों से भी ज्यादा हैं. लाख रुपए का पर्सनल लोन लेकर सूदसमेत दो लाख रुपए चुकाता है. इसलिए गृहिणियां बीसी खेलती हैं. जब-जब पैसा मिलता है कोई बड़ी चीज खरीद लेती हैं. पर बीसी का यह खेल तब महंगा पड़ जाता है जब आपकी पहचान आपकी औकात से बड़ी हो. महिला इंटीरियर डिजाइनर थी. उसके बड़े बड़े क्लायंट थे. इसके चलते बीसी बड़ी होती चली गई और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई. और एक हंसता खेलता परिवार बर्बाद हो गया.

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