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गुस्ताखी माफ: धरती पर बढ़ रहा इंसानी आबादी का बोझ

By @dmin
Published: July 11, 2022
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गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
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-दीपक रंजन दास
आज विश्व जनसंख्या दिवस है। आबादी का बोझ अकेले भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में बढ़ रहा है। कभी 10-12 बच्चे पैदा करने वाले परिवार अब एक या दो बच्चे पैदा कर रहे हैं पर आबादी बढ़ती ही चली जा रही है। हम दो-हमारे दो का फलसफा भी अब इसका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा है। कुछ लोग इसके लिए एक खास समुदाय के लोगों को जिम्मेदार मान रहे हैं – पर यह सही नहीं है। आबादी में उनका हिस्सा बढ़ रहा है तो इसका कारण कुछ और है। पर यहां बात आबादी की हो रही है। दरअसल इस आबादी का परिवार नियोजन की जागरूकता से कोई लेना देना नहीं है। पिछले कुछ दशकों में चिकित्सा विज्ञान ने काफी प्रगति की है। विकास की गाड़ी भी तेजी से आगे बढ़ी है। संस्थागत प्रसव बढ़े हैं, जच्चा बच्चा देखभाल की सुविधाएं बढ़ी हैं। मातृत्व देखभाल की योजनाएं फलीभूत हुई हैं। इधर बेहतर भोजन और स्वास्थ्य सुविधाओं के चलते जीवन प्रत्याशा भी बढ़ी है। इसका कुल नतीजा यह निकला है कि जच्चा-बच्चा मृत्यु के मामलों में कमी आई है और बीमारियों से मरने वालों की संख्या भी कम हुई है। नवजात मृत्यु दर (आईएमआर) की बात करें तो यह 2022 में 27.69 प्रति हजार जीवित प्रसव हो गई। 2021 के मुकाबले यह 3.74 प्रतिशत कम है जब प्रति हजार जीवित प्रसव में 28.771 नवजातों की मौत हो जाती थी। 1981 में यह दर 9.7 थी। मातृत्व मृत्यु दर में भी तेजी से कमी आई है। 2016-18 के बीच यह दर 113 प्रति एक लाख प्रसव थी जो 2014-16 के बीच 130 प्रति एक लाख प्रसव थी। इसी तरह जीवन प्रत्याशा बढ़ी है। वहीं दूसरी तरफ बेहतर स्वास्थ्य और पोषण के चलते जीवन प्रत्याशा भी बढ़ रही है। 2021 में औसत जीवन प्रत्याशा 69.9 वर्ष थी। यानी लोग औसतन लगभग 70 वर्ष जीते थे। 2022 में यह दर बढ़कर 70.19 वर्ष हो गई। इसमें लगभग 0.33 प्रतिशत का सुधार हुआ। सन् 2000 में यह दर 62.28। अर्थात एक तो जन्म के समय होने वाली जच्चा-बच्चा की मौत के मामलों में कमी आ रही है, वहीं दूसरी तरफ लोग ज्यादा सालों तक जी रहे हैं। अब तो आबादी रोकने या उसे रिवर्स गीयर में डालने का केवल एक ही रास्ता बचा है। लोग शादियां न करें और करें भी तो बच्चे न पैदा करें। वैसे भी देश में अब अविवाहित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। बड़ी संख्या में युवा शादी न करने का फैसला कर रहे हैं। हालांकि 32-35 साल की उम्र के बाद इनमें से अधिकांश अपना संकल्प तोड़ रहे हैं। पर यह ट्रेंड अब बढ़ता जा रहा है। अविवाहित लोगों की सफलता इन्हें प्रेरित कर रही है।

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