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गुस्ताखी माफ: गोबर का मिल रहा दाम, उधर दूध किसान परेशान

By Om Prakash Verma
Published: November 18, 2022
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
देवता का भोग संकट में है. हालत पूजा पंडालों जैसी हो गई है. 56 भोग घटते-घटते खीरे के टुकड़ों पर आ टिका है. जी हां! बात कर रहे हैं सरकारी दूध कंपनी देवभोग की. अच्छा खासा धंधा चल रहा था. नगद की बिक्री थी. रेट बढ़ाने की छूट थी. बावजूद इसके धंधे में निजी के आगे टिक नहीं पाया. दूध किसानों का भुगतान रोकना कंपनी को भारी पड़ गया. अब कंपनी के पास पर्याप्त दूध नहीं है. यही आलम रहा तो जल्द ही अपनी पूंछ चबाने की नौबत आ जाएगी. दरअसल, सरकारी उपक्रमों की यही दिक्कत है. सरकारी नौकरी का मतलब केवल वेतन, भत्ता, पदोन्नति और एरियर्स होकर रह गया है. जरा सी कटौती हुई नहीं कि सड़कों पर आकर बैठ जाते हैं. निजी कंपनी में कोई इस तरह आंखें तरेरे तो उसे बाहर जाने का रास्ता दिखाया जा सकता है. देवभोग के ओहदेदार आखिर कर क्या रहे हैं? क्या वजह है कि नगद बिक्री वाले धंधे में भी किसानों को पैसा दो-ढाई महीने बाद मिल रहा है? किसान से 31 रुपए लिटर में दूध खरीदकर उसे 52 से 58 रुपए लिटर नगद बेचा जाता है. दही, घी का भी नगद व्यवसाय है. 2018-19 तक यहां प्रतिदिन एक लाख लीटर से ज्यादा दूध एकत्र होता था. अब 50 हजार लीटर दूध इक_ा करने में ही पसीना छूट रहा है. कोई भी धंधा डायनामिक होता है. स्थितियां परिस्थितियां कभी एक सी नहीं रहती. जब देवभोग ने छत्तीसगढ़ में अपना मार्केट शेयर बढ़ाना शुरू किया तो निजी कंपनियों के कान खड़े हो गए. उन्होंने गांव-गांव में अपने आदमी लगा दिये. दूध किसानों को तत्काल भुगतान की गारंटी मिली तो उन्होंने दूध उन्हें बेचने शुरू कर दिया. जिन गांवों में चिल्हर खरीदी थी, निजी कंपनियों ने उन्हें दोयम दर्जे में डाल दिया. उन्होंने वहां फोकस किया जहां से कम ढुलाई लागत पर ज्यादा दूध एकत्र किया जा सके. देवभोग को जाने वाला आधा दूध निजी दूध कंपनियों के पास पहुंच गया. देवभोग के पास दूध कम हुआ तो प्रॉडक्ट भी कम हो गए. मार्केट शेयर भी कम हो गया. मुनाफे में चल रहा देवभोग घाटे में आ गया. हालात नहीं बदले तो वह दिन भी दूर नहीं जब किसान सारा दूध निजी कंपनियों को बेच रहे होंगे. सरकार के लिए किसानों के पास केवल गोबर-गोमूत्र रह जाएगा. बात अकेले देवभोग की नहीं है. सरकारी बैंक, सरकारी आधारभूत उद्योग सब की ऐसी ही हालत है. उद्योगों का निजीकरण तो नहीं हो पाया पर प्रोसेस आउटसोर्सिंग के चलते आधे से ज्यादा काम निजी हाथों को चला गया. सरकारी बैंक तमाम कागजात बटोरकर दफ्तर में बैठे गैर निष्पादित आस्तियां (एनपीए) गिन रहे हैं और निजी फाइनेंसर मामूली खानापूर्ति पर लाखों रुपए का लोन दे रहे हैं और मजे से कमा भी रहे हैं. टू-व्हीलर, फोर-व्हीलर चुटकियों में फाइनेंस हो रहे हैं. बजाज फिनसर्व पर्सनल लोन पर निजी सूदखोर के बराबर ब्याज भी वसूल रहा है.

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