-दीपक रंजन दास
यूपी-बिहार में एक कहावत है… कंधे पर बैठाए हैं तो क्या कान में मूतोगे? छत्तीसगढ़ में तथाकथित कालोनाइजर, बिल्डर और डेवलपर्स का यही हाल है। ये सभी सरकारी आदमियों के कंधे पर बैठे हैं। जिनके अपने घरों में रोज मकान के डिजाइन को लेकर झगड़ा होता है वो भी फ्लैट डिजाइन कर रहे हैं। सरकारी का हाल तो इससे भी बुरा है। यहां लिविंग रूम – जिसे आजकल हॉल कहते हैं, भी दस बाई दस के होते हैं। इतने से कमरे में तीन-तीन दरवाजे होते हैं। लिहाजा सरकारी आवासों को लेवाल नहीं मिल रहे और इधर प्राइवेट बिल्डर मलाई छान रहे हैं। निजी पार्टियों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इनकी पटवारियों से जबरदस्त सेटिंग है। ये सरकारी जमीनों का पता तो लगा ही लेते हैं इन्हें गरीब किसानों को फंसाना भी खूब आता है। कंगला किसान को 5-10 लाख रुपए नगद हाथ में दे दो तो वह पावर ऑफ अटार्नी लिख देता है। आज जिधर भी जाओ सड़क किनारे की जमीन पर या तो जमीन बिकाऊ है की तख्ती लगी मिलेगी या फिर एक फोन नंबर लिखा हुआ मिलेगा। धमधा रोड का तो यह आलम है कि दलाल मोटरसाइकिल पर मोल्डेड प्लास्टिक की कुर्सी बांधकर निकल पड़ते हैं। जहां भी छांव मिलती है मोटरसाइकिल को स्टैंड पर लगाकर कुर्सी लगा लेते हैं। मोटरसाइकिल पर प्लाट/फ्लैट बिकाऊ का फ्लैक्स बांध देते हैं। दरअसल, ये दलाल टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के कंधे पर सवार हैं। अब कंधे पर सवार हैं तो कान में मूतना तो बनता ही है। विभाग केवल कागजों पर चलते हैं। बलौदाबाजर जिले से एक खबर आई है कि वहां 246 कालोनियां हैं जिसमें से केवल 26 वैध हैं। 220 कालोनियां अवैध हैं। यह कैसे संभव हुआ? क्या अधिकारियों की आंख में मोतियाबिंद है? या ये जानबूझकर अपनी आंखें बंद रखते हैं। कान में तो पहले ही….। होने को तो कुछ भी हो सकता है पर हकीकत यही है कि सभी साहब दफ्तर में बैठकर कागज खंगालने के एक्सपर्ट हैं। जमीनी हकीकत से इनका कोई लेना देना नहीं। 2014 के बाद यहां कालोनियों का कोई सर्वे नहीं हुआ। जमीन खरीदी जाती है – अखबारों में विज्ञापन लगते हैं, शहर में बड़े बड़े पोस्टर-होर्डिंग लगते हैं, पर ये उनका संज्ञान नहीं लेते। लें भी तो कैसे? इन बिल्डरों-डेवलपरों की तस्वीरें आए दिन अखबारों में किसी न किसी कद्दावर नेता के साथ छपती हैं। कुछ बिल्डर सस्ते में काम चला लेते हैं। ये अपने नेताओं को उनके जन्मदिन की बधाई सार्वजनिक रूप से देते हैं। बड़े-बड़े पोस्टर, बैनर, फ्लैक्स छपवाकर सड़कों पर टांग देते हैं। विभाग कालोनाइजर को चिी लिखता है। कालोनाइजर उसे नेताजी को दिखा देता है। बात आई गई हो जाती है और सब मिलकर गाते हैं – चिी आई है, आई है, चि_ी आई है।
गुस्ताखी माफ: कंधे पर बैठाओगे तो कान में ही…




