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गुस्ताखी माफ: असली ताकत दिमाग में….

By @dmin
Published: July 4, 2022
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गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
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-दीपक रंजन दास
कहा जाता है कि असली ताकत दिमाग में होती है। दिमाग कहता है कर सकते हो तो काम हो जाता है, मना करता है तो आसान काम भी बहुत कठिन हो जाता है। इसी बात को चरितार्थ कर दिखाया है देश के 8 जांबाज कैंसर विजेताओं ने। इन्होंने न केवल कैंसर को मात दी बल्कि इलाज के दौरान भी अपना कामकाज जारी रखा था। पर अब इन लोगों ने जो किया है, उससे अच्छे खासे फिट लोग भी हैरान रह जाएंगे। इन्हें बर्फीली हवाओं के बीच हिमालय पर फतह पाई है। 8 लोगों की इस टीम को स्पांसर किया था अपोलो हॉस्पिटल बिलासपुर ने। इनका प्रशिक्षण ट्रेकिंग इंडिया हाइक में हुआ तथा उनकी ही देखरेख में इन्होंने दयारा 12 हजार फीट ऊंची बुग्याल चोटी पर फतह पाई। चार दिन और तीन रातें बर्फीली हवाओं के बीच काटकर उन्होंने अपना अभियान पूरा किया। इस अभियान को नाम दिया गया था पीक-टू-पीक अर्थात चोटी से चोटी तक। कैंसर को मात देकर एक चोटी वो पहले ही फतह कर आए थे अब हिमालय को फतह करना था। इस अभियान में बिलासपुर की प्रियंका राजेश शुक्ला के अलावा स्वागतिका, श्रुति, बैंगलोर से अर्चना होशंगणी, अमिताभ सरकार, सुश्रुत और 71 वर्षीय रिटायर्ड इसरो साइंटिस्ट डॉ. कुणाल कुमार दास शामिल थे। इलाज के बाद इनमें से अधिकांश की हालत ऐसी थी कि चार कदम चलकर थक जाते थे। चिकित्सकों ने कहा – हिम्मत से काम लो, अब आप पूरी तरह ठीक हो। घर वालों ने भी मनोबल बढ़ाया। पर हिमालय पर चढऩे की बात तो तब भी कभी दिमाग में नहीं आया था, जब वे पूरी तरह स्वस्थ थे। पर अब जीवन ही एक चुनौती बन गई थी इसलिए जब उन्हें हिमालय ट्रेक का न्यौता मिला तो वे सहर्ष राजी हो गए। कुछ जांचें हुईं और आवेदन करने वालों में से आठ को शार्टलिस्ट किया गया। दरअसल यह अभियान छेड़ा ही इसलिए गया कि बात लोगों तक पहुंचे। हमारे आसपास दर्जनों ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें लोगों ने अपनी कमजोरियों को ही अपनी ताकत बनाया है और उन्नति के शिखर पर जा बैठे हैं। अपने ही शहर की बात करें तो एक अंग्रेजी का अध्यापक है जो यहां सबसे बड़ा कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाता है। वह खुले मन से स्वीकार करता है कि एक मेधावी इंजीनियर होने के बाद भी उसे इंटरव्यू में वांछित सफलता इसलिए नहीं मिलती थी कि उसे अंग्रेजी नहीं आती। फिर उसने अंग्रेजी सीखना शुरू किया और कुछ ऐसा ही सीखा कि इंजीनियरिंग को ताक पर रखकर वह अंग्रेजी पढ़ाने भिलाई आ पहुंचा। उसने उस शहर को चुना जहां इंग्लिश मीडियम के कई नामचीन स्कूल थे। जो बच्चों के साथ खुदकुशी करने निकली थी उसने मुड़कर देखा और आज पद्मश्री फूलबासन यादव के नाम से जाती हैं।

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