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गुस्ताखी माफ: अब साहबों के दिन लदे, कैसे होगा काम

By @dmin
Published: August 20, 2022
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गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
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-दीपक रंजन दास
अंग्रेजों के जमाने में मजदूरों और कर्मचारियों से काम कराने के लिए सख्त नियम कायदे होते थे. इसका असर आजाद भारत में भी देखा गया. लोग समय पर दफ्तर या फैक्टरी जाते, पूरे समय काम करते और छुट्टी होने के बाद ही बाहर निकलते. एक-दो पीढ़ी क्या गुजरी, समय का कंसेप्ट ही खत्म हो गया. कर्मचारियों को समय पर आने-जाने के लिए मजबूर करने बायोमैट्रिक्स सिस्टम लगाया गया. इसमें मिनट के साथ सेकंड भी दर्ज होने लगा. फील्ड वर्कर्स को लोकेशन भेजने और वीडियो कॉल करने के लिए कहा जाने लगा. यह जरूरी इसलिए भी था कि ऊंचे पदों पर बैठे जिम्मेदार लोगों पर ही योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी होती है. इसलिए कर्मचारियों से काम लेने के लिए कुछ तो अधिकार मिलने ही चाहिए. आजाद भारत में किसी को खंबे से बांधकर पीटा तो नहीं जा सकता और न ही सार्वजनिक तौर पर उसकी बेइज्जती की जा सकती है. इसलिए सीआर उनके पास एक बड़ा हथियार था. वे गुपचुप कर्मचारियों की सीआर में उसके आचरण की टीप दर्ज कर देते थे. इसका भय ही लोगों को अधिकारियों से उलझने से रोकता था. पर अब इस परिपाटी में छेद किया जा रहा है. इसकी शुरुआत रेलवे ने की है. रेलवे ने अब अपने कर्मचारियों को भी अपने अफसरों की सीआर लिखने का अधिकार दे दिया है. इसके लिए पहले से मौजूद डेटाबेस सिस्टम एचआरएमएस यानी ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम को अपग्रेड किया जा रहा है. इसका लिंक जल्द ही सभी कर्मचारियों को दिया जाएगा. प्रत्यक्षत: इसका एक लाभ तो होगा. अधिकारी अब मनमानी नहीं कर सकेंगे, उनके गलत और संदिग्ध आचरण का चि_ा सीआर में दर्ज हो गया तो उनकी शामत भी आ सकती है. इससे भ्रष्टाचार पर भी कुछ हद तक अंकुश लग सकता है. पर इस कड़वी दवा के साइड इफेक्ट भी हैं. कर्मचारी संगठित होते हैं. वे षडयंत्रपूर्वक भी सख्त अधिकारी के लिए गड्ढा खोद सकते हैं. रेलवे देश में सरकारी क्षेत्र का सबसे बड़ा इकलौता नियोक्ता है. रेलवे में यदि यह सिस्टम सफल हो गया और इसके अच्छे नतीजे आने लगे तो इसे अन्यान्य जगहों पर भी लागू किया जा सकता है. पर माननीयों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. जनप्रतिनिधि होने के नाम पर वे कभी भी किसी की भी बेइज्जती कर सकते हैं. इससे उसकी छवि दमदार होती है. छत्तीसगढ़ की ही बात करें तो कई नेता सरकारी अफसरों के साथ बदतमीजी करते पाए गये हैं. एक नेता ने तो थप्पड़ ही जड़ दिया था. हालांकि इसका खामियाजा उसे बाद में भुगतना पड़ा पर अमूमन ऐसे नेताओं के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं होती. नेताओं का सीआर लिखने का भी अधिकार यदि अधीनस्थ अफसरों-कर्मचारियों को लिखने के लिए दे दिया जाए तो शायद ज्यादा अच्छा होगा. भ्रष्टाचार पर भी प्रभावी अंकुश लगेगा और जनता को न्याय मिलेगा.

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