श्रीकंचनपथ न्यूज डेस्क
भिलाई। भाजपा के बस्तर चिंतन को दो माह से ज्यादा वक्त बीत चुका है, लेकिन उसके नतीजों पर जमीनी स्तर पर अमल होता नहीं दिख रहा है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव से करीब दो साल पहले ही तैयारियां शुरू की थी और माना जा रहा था कि इससे मुद्दों पर फोकस करने, कार्यकर्ताओं को चार्ज करने और सरकार को घेरने में उसे सफलता मिलेगी। लेकिन पार्टी के लोगों को लग रहा है कि अभी भी संगठन के लोग जन-सरोकारों से पल्ला झाड़ रहे हैं। 2018 से पहले कांग्रेस ने हाफ-माफ-साफ की नीति अपनाई थी, इसका तोड़ भी अब तक पार्टी नहीं निकाल पाई है। स्थानीय नेतृत्व उभारना था, ताकि चुनाव में नए चेहरों पर दांव लगाया जा सके, किन्तु ऐसा भी नहीं किया जा रहा है।

देर आए-दुरूस्त आए की तर्•ा पर छत्तीसगढ़ भाजपा ने बस्तर में चिंतन शिविर रखा था, जिसमें देश और प्रदेश के कई बड़े नेताओं ने शिरकत की। यह पहला अवसर था, जब राजधानी से इतर, बस्तर जैसे आदिवासी इलाके में चिंतन शिविर रखा गया। यह आदिवासियों का गढ़ वही बस्तर था, जहां से भाजपा को विधानसभा चुनाव में महज 1 सीट मिली थी और जो बाद में हुए उपचुनाव में हाथ से निकल गई। बस्तर चिंतन में क्षेत्र की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने, संगठनात्मक फेरबदल समेत भविष्य की कार्ययोजना तैयार करने पर चर्चा हुई थी।
अब इस चिंतन शिविर के दो महीने बाद देखें तो न तो पार्टी-संगठन द्वारा ज्यादा सीटें जीतने पर फोकस किया जा रहा है, न ही संगठनात्मक फेरबदल हुए हैं। भविष्य के लिए कोई कार्ययोजना बनाई गई है, ऐसी भी खबर नहीं है। इसके विपरीत आम लोगों से सीधे जुडऩे वाले ज्वलंत और दीर्घकालिक मुद्दों पर भी पार्टी का ठंडा रूख सामने आया है। यूपी के लखीमपुर खीरी में जिस तरह से प्रदेश कांग्रेस ने दखलंदाजी की, उस पर भाजपा नेतृत्व शांत नजर आया। वहीं कवर्धा के मसले पर भी भाजपा अपना स्पष्ट पक्ष रखने में नाकाम रही। इसके अलावा पीडीएस मामले पर छुटपुट आवाजें जरूर उठीं, किन्तु उसे मुद्दा बनाने में पार्टी नेताओं की दिलचस्पी नहीं दिखी। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि कमजोर भूमिका निभाकर भाजपा अपना खोया जनाधार कैसे हासिल करेगी।
मुद्दाविहीन राजनीति
2018 के चुनाव में बुरी तरह से मिली पराजय को लगता है कि पार्टी अब भी स्वीकार नहीं कर पा रही है। शायद यही वजह है कि उसके नेता प्रदेश से जुड़े अहम् मसलों को पकडऩे में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। हालांकि जानकारों का कहना है कि क्योंकि अभी चुनाव को करीब 2 साल का वक्त है, इसलिए भाजपा के लोग ठंडे हैं। दूसरी ओर कई लोगों का यह भी मानना है कि पार्टी को कम से कम एक मजबूत विपक्ष की भूमिका तो निभानी ही चाहिए। ऐसा भी नहीं है कि राज्य में बतौर विपक्षी दल भाजपा के पास मुद्दों की कमी हो। फिलहाल 90 सीटों वाले छत्तीसगढ़ विधानसभा में भाजपा के पास महज 14 सीटें ही है। संभव है कि प्रदेश भाजपा में आत्मविश्वास की कमी आड़े आ रही हो।
इन पर करना होगा फोकस
भाजपा को यदि मिशन 2023 में अपनी नैय्या पार लगानी है तो उसे कई प्रमुख स्थितियों से पार पाना होगा। सत्ता बदलने के बाद राज्य में छत्तीसगढिय़ावाद का बोल-बाला बढ़ा है। ऐसे में जरूरी है कि उसे इस सबसे प्रमुख मसले को पूरी गम्भीरता से आत्मसात करना होगा। आदिवासी इलाके में चिंतन शिविर कर आदिवासी वोट कबाडऩे की नीति अपनी जगह सही है, किन्तु पार्टी को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मैदानी इलाकों में भी वह पूरी तरह साफ रही है। राज्य के 5 संभागों को देखें तो बस्तर और सरगुजा में उसके पास एक भी सीट नहीं है। दुर्ग संभाग में महज 2 सीटें हैं, जबकि बिलासपुर संभाग में 7 और रायपुर संभाग में 5 सीटें है।
वहीं नए चेहरों को सामने लाना भी भाजपा के लिए जरूरी से ज्यादा मजबूरी है। दरअसल, पार्टी के वरिष्ठ नेता अपने इलाकों में नया नेतृत्व उभरने नहीं देते। इसके चलते द्वितीय पंक्ति तैयार ही नहीं हो पा रही है। बड़े नेताओं की गुटबाजी भी किसी से छिपी नहीं है। मेरा प्रत्याशी-तेरा प्रत्याशी के चलते गुटों में बँटे कार्यकर्ता अपना ही नुकसान करते हैं। ऐसे में सबसे पहले तो स्थानीय गुटबाजी पर अंकुश लगाना पार्टी की प्राथमिकता होनी चाहिए। स्थानीय से लेकर प्रादेशिक मुद्दों पर भी पार्टी का रूख पूरी तरह साफ नहीं हो पाता है। इसके चलते भाजपा मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने में नाकाम साबित होती रही है। दूसरी ओर, कानून-व्यवस्था समेत कई ऐसे मसले हैं, जिन पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की चुप्पी संदेहास्पद है।
तेवर भूले भाजपाई
भाजपा को विपक्ष की पार्टी कहा जाता है, क्योंकि वह विपक्ष में रहकर सरकार को घेरने में माहिर है। किन्तु लगता है 15 साल सत्ता में रहने की वजह से पार्टी के नेता अपने तेवर भूल गए हैं। मुद्दे उठाने से लेकर कार्यकर्ताओं में जोश भरने तक में पार्टी नेतृत्व नाकाम है। कई ज्वलंत मसलों पर उसके नेताओं की खामोशी सवालिया निशान छोड़ती है। कार्यकर्ता लम्बे समय से असहज महसूस कर रहे हैं। उन्हें वरिष्ठ नेताओं के व्यवहार, उनकी रीति-नीति और जीतने के बाद नजरअंदाज किए जाने को लेकर खासी नाराजगी है। प्राथमिक तौर पर पार्टी को इस पर फोकस करने की दरकार है, अन्यथा बस्तर का चिंतन महज रस्म अदायगी ही साबित होगा।




