– दीपक रंजन दास
दूध के साथ दही को भी खान-पान में श्रेष्ठ स्थान हासिल है. इसे शुभ भी माना गया है. चरणामृत में तो यह जाता ही है, शुभ कार्यों के लिए जाते समय लोग दही-शक्कर खाकर जाते हैं. परीक्षा देने के लिए जाते समय बच्चे दही का टीका भी लगा लेते हैं. पर यही दही जब मुंह में जमा ली जाए तो सबकुछ निगेटिव हो जाता है. मुंह में दही जमा लेना श्रेष्ठ नौकर होने का गुण है. देश छोटा हो या बड़ा, सरकार चौक-चौराहे पर नहीं बैठी होती. स्थल पर उसके नुमाइंदे ही होते हैं. नुमाइंदे मुंह में दही जमा लेते हैं तो अच्छा खासा काम भी दुष्प्रचार का सबब बन जाता है. इन दिनों यही सबकुछ हो रहा है सुपेला के रेलवे फाटक पर. रेलवे का यह व्यस्ततम रूट है. बीच शहर होने के कारण सड़क पर भी यातायात का भारी दबाव है. हाल ही में पुलिस द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि प्रतिदिन औसतन इस रेलवे फाटक से 1.7 लाख से भी अधिक वाहनों का आना जाना होता है. बार-बार फाटक बंद होने के कारण यहां जाम भी लग जाता है. दशकों पहले से यहां ओवरब्रिज या अंडरब्रिज की मांग की जा रही है. विडम्बना यह रही कि मांग सुपेला से उठती रही और अंडरब्रिज कभी चंद्रा मौर्या के पास तो कभी प्रियदर्शिनी परिसर के पीछे बनता रहा. आखिरी दो अंडरब्रिज नेहरू नगर और पावर हाउस में बने हैं. चार-चार अंडरब्रिज बनने के बाद भी यहां की समस्या जस की तस है. पटरी को पार करने के लिए इसके अलावा दो ओवर ब्रिज भी हैं पर वो भी नेहरू नगर और पावर हाउस में हैं. अब जाकर सरकार ने सुपेला में अंडरब्रिज का काम शुरू करने का फैसला किया है. कहां तो इस फैसले का स्वागत किया जाता, इसका विरोध शुरू हो गया है. कारण केवल मौसम है. बारिश के दौरान काम शुरू होने पर लगभग पौने दो लाख लोगों को वैकल्पिक रास्ता तलाशना पड़ेगा. चंद्रा मौर्या और प्रियदर्शिनी परिसर का अंडरब्रिड बारिश के दिनों में डूब जाता है. पानी भरे अंडरब्रिज में कई हादसे हो चुके हैं. सरकार ने काम शुरू करने को कहा है. अब यह जिम्मेदारी यहां बैठे लोगों की है कि वे वस्तुस्थिति से अवगत कराएं और उसकी तिथि को आगे बढ़ाएं. पर यहां तो मुंह में दही जमा हुआ है. कोई वह नहीं बोलेगा जो उसे बोलना चाहिए. वह केवल आदेश की कापी दिखाएगा. इससे जनता भड़केगी, कुछ नए नेता उभरेंगे. कोई नाम कमाएगा तो कोई बदनाम भी होगा. ‘मुंह में दही’ संस्कृति अच्छे-अच्छों को ठिकाने लगा चुकी है. ऊपर बैठे लोगों को लगता है, नीचे सबकुछ ठीक है. कदाचित राख में दबी चिंगारी उन्हें दिखाई नहीं देती. तकरीबन सभी सरकारी योजनाओं की वाट इसी संस्कृति के कारण लगती रही है.





