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गुस्ताखी माफ़: सरकार तो कर ही रही, जिम्मेदारी हमारी भी

By Om Prakash Verma
Published: December 19, 2022
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार कितना भी काम करे, जब तक समाज आगे नहीं आएगा, इसका लाभ सब तक नहीं पहुंच सकता. महिला कमांडों बनाकर चर्चा में आई बालोद की पद्मश्री शमशाद बेगम इसी नारे के साथ आगे बढ़ रही हैं. उन्हें पता है कि स्कूलों के दरवाजे खुल जाने और मध्यान्ह भोजन मिलने के बावजूद गरीब बच्चों की शिक्षा अभी लक्ष्य से बहुत दूर है. उन्होंने समाज से लेकर इन बच्चों की जरूरतें पूरी करने का फैसला किया है. बालोद जिले में उन्होंने इसपर काम भी किया है और अब पड़ोसी जिलों में इस अभियान को आगे बढ़ाने जा रही हैं. योजना के तहत लोगों से कापी-किताब-पेन-कम्पास और ३०० रुपए की नगद राशि एकत्र कि जाएगी. इन्हें उन बच्चों तक पहुंचाया जाएगा तो पढ़ता तो चाहते हैं पर अर्थाभाव के कारण उनके पास पर्याप्त साधन नहीं हैं. इन सामग्रियों का वितरण दानदाता स्वयं कर सकेंगे. दानदाताओं-सहयोगकर्ताओं का सम्मान भी किया जाएगा. दरअसल, उन्होंने वही किया है जो संस्कारों ने उन्हें सिखाया है. विश्व के प्रायः सभी धर्मं में कमाने वाले अपनी आय का एक हिस्सा समाज के जरूरतमंदों के लिए दान कर देते हैं. उन्हें नहीं पता होता कि इस राशि से किसका भला हो रहा है पर वे इससे कभी पीछे नहीं हटते. सनातन धर्म में दरिद्र को नारायण मानकर उसकी सेवा की जाती रही है. आज भी कुछ लोग ठंड से पहले कंबल चादरें, दोहड़ बांटने निकल पड़ते हैं. कोई अलाव की व्यवस्था कर देता है तो कोई भोजन बांट आता है. पूरा समाज मिलकर ऐसी कोशिश करे तो समस्या चुटकियों में हल हो सकती है. दरिद्रों की संख्या हर काल में उंगलियों पर गिने जाने लायक ही होती है. सेक्टर-२ और सेक्टर-८ में संचालित आस्था, सेक्टर-३ में संचालित फील परमार्थम फाउंडेशन जैसी संस्थाएं वृहत्तर समाज के लिए वही कर रही हैं जो शांतिनगर में मजर टेरेसा आश्रम कर रहा है. हम सभी ऐसा कर सकते हैं. कितना अच्छा हो तो मंदिर में एक दान पेटी गरीबों की मदद के लिए भी लगी रहे. शराब भट्टियों पर भी एक पेटी जरूरतमंदों के लिए लगाई जाए. साफ साफ लिखा हो कि खुद बर्बाद होने से पहले समाज का कुछ भला कर जाओ. इस कार्य में विद्यार्थी समुदाय को शामिल कर लिया जाए तो सोने पर सुहागा हो जाए. समाज को लगता है कि आज का युवा संवेदनाशून्य हो गया है. उसे अपने सिवा किसी और की पड़ी नहीं है. पर ऐसा नहीं है. आज जितनी बड़ी संख्या में युवा समाज सेवा की ओर मुड़ रहे हैं, उसकी कोई मिसाल इतिहास में नहीं मिलेगी. इन बच्चों की आंखों में एक सपना है. ये वो तकनीक सीखने की कोशिश कर रहे हैं जिससे वृहत्तर समाज का सहयोग लेकर जरूरतमंदों की मदद की जा सकती है. यह बहुत बड़े पैमाने पर होने वाला काम हैं. संपन्न लोगों के अलावा प्रवासी भारतीय भी जरूरमंदों की मदद करना चाहते हैं, बस उनके पास वक्त नहीं होता. युवा इसका जरिया बन रहे हैं.

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