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गुस्ताखी माफ़: उत्कृष्ट विद्यालयों के मामले में हड़बड़ी ठीक नहीं

By Om Prakash Verma
Published: December 24, 2022
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ में 15 साल सत्ता से बाहर रही कांग्रेस थोड़ी हड़बड़ी में है. वह रातों रात राज्य के नक्शा बदलने की कोशिश कर रही है. योजनाएं अच्छी हैं, कहीं कहीं उसके बेहतरीन नतीजे भी आ रहे हैं पर रिकार्ड बनाने की होड़ में कई स्थानों पर योजना का मजाक भी बन रहा है. आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालयों को ही लें तो इस योजना को सभी ने हाथों-हाथ लिया था. इनमें से कुछ स्कूलों की व्यवस्था तो राज्य के बड़े निजी स्कूलों से भी अच्छी है. इससे बड़ी संख्या में पालकों को शिक्षा के भारी भरकम खर्च से राहत मिली है. पर सभी जगहों पर ऐसा नहीं है. जो हाल सरकारी सामान्य स्कूलों का था, धीरे-धीरे उत्कृष्ट विद्यालय भी उसी रास्ते पर चल पड़े हैं. राजधानी रायपुर के एक स्कूल की खबर आई है कि वहां केवल दो कक्ष और एक हाल में लगभग 900 बच्चे अध्ययनरत हैं. पर्याप्त स्थान नहीं होने के कारण यहां एक अजीब सी व्यवस्था बनाई गई है. बच्चे एक दिन छोड़ कर एक दिन स्कूल आते हैं. अल्टरनेट डेज स्टडी का यह प्लान डीईओ के साथ मिलकर तैयार किया गया है. कुछ बच्चे को हफ्ते में तीन दिन की छुट्टी पाकर खुश हैं पर गुरुजियों की हालत खराब है. पीरियड्स कम होने के कारण उन्हें कोर्स की रफ्तार बढ़ानी पड़ी है. बच्चों के प्रतिदिन नहीं आने के कारण सीखने-सिखाने का लय-ताल बिगड़ रहा है. क्या पढ़ा रहे हैं, बच्चे कितना पढ़ पा रहे हैं, किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा है. फिर भी स्कूल उत्कृष्ट विद्यालय कहला रहा है. दरअसल, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में रिकार्ड बनाने की होड़ नहीं होनी चाहिए. संख्या बढ़ाकर ढोल पीटने का फायदा कुछ नहीं होता. लोग तो मांग करते ही रहेंगी पर बिना तैयारी के मांगों को पूरा करने की घोषणा करना भी मुसीबतें खड़ी कर सकता है. कोरोना काल के दौरान यही हुआ. स्कूल कालेज सब बंद थे. चूंकि फीस नहीं आ रही थी इसलिए संचालकों ने टीचर्स की भी छुट्टी कर दी. इसके बाद नए सिरे से स्कूल को प्रारंभ करने में कई संचालक असफल रहे. लिहाजा इन स्कूलों के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में आ गए. हर कस्बे से अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की मांग होने लगी और सरकार ने इनकी स्वीकृति भी दे दी. विकास की यह रफ्तार इतनी तेज थी कि तीन साल में उत्कृष्ट विद्यालयों की संख्या तीन गुना तक बढ़ गई. इस अंधाधुंध रफ्तार के कारण योजना के साथ हादसा तो होना ही था. हुआ भी और हो भी रहा है. सरकार ने अगले साल इनकी संख्या लगभग दुगनी करने की घोषणा कर दी है. बेहतर होगा सरकार संख्या बढ़ाने की बजाय, इनकी गुणवत्ता पर ध्यान दे. वरना इनमें से कुछ स्कूलों की मुफलिसी पूरी योजना को बदनाम कर देगी.

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