-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सातवीं कक्षा की एक छात्रा अन्विका गुप्ता ने विलक्षण वैज्ञानिक गुण का परिचय दिया है. राजातालाब स्थित बीपी पुजारी सरकारी स्कूल की इस छात्रा को पता चला कि उनके स्कूल की एक सहायिका तालाब में नहाकर ठीक हो गई. सहायिका को चर्मरोग था. छात्रा ने सुन रखा था कि सल्फर युक्त पानी से कुछ चर्मरोग ठीक हो जाते हैं. उसने तप्तपानी स्रोतों के बारे में भी सुना था, जहां चर्मरोगी नहाने जाते हैं. पहले तो बच्चों के बीच ही उसने अपने विचार को रखा और फिर स्कूल के टीचर्स से भी इसकी चर्चा की. मन में सवाल उठ चुका था और छात्रा ने जिद पकड़ ली थी कि वह अपने अंदाजे की पुष्टि करके रहेगी. उक्त सहायिका ने शहर के कंकाली तालाब में स्नान किया था. चर्मरोग से पीड़ित अनेक लोग यहां आते हैं. मान्यता है कि यहां स्नान करने वाले लोगों के चर्मरोग कंकाली माता हर लेती हैं. छात्रा ने कंकाली तालाब के पानी का सैम्पल लिया. इसके साथ ही उसने राजातालाब और बूढ़ा तालाब के पानी का भी सैंपल लिया. पानी के इन नमूनों की जांच उसने शहर के ही एक निजी लैब में करवाई. उसका शक सही निकला. कंकाली तालाब के पानी में सल्फर की मात्रा राजातालाब और बूढ़ा तालाब की तुलना में लगभग दोगुना थी. राजा तालाब में 2.45, बूढ़ातालाब में 3.94 और कंकाली तालाब में 8.1 मिली ग्राम प्रति लीटर की मात्रा में सल्फर पाया गया. दरअसल, विज्ञान सवालों से शुरू होता है. सदियों से लोग सेब को गिरता हुआ देख रहे थे. न्यूटन ने भी देखा पर उसके मन में सवाल उठा. उसने सवाल का हल ढूंढने की कोशिश की और गुरुत्वाकर्षण की खोज हो गई. इसी तरह लोग सालों से तप्तपाणि कुण्डों में डुबकियां लगा रहे हैं. किसी-किसी का चर्मरोग ठीक भी हो रहा है. ऐसे कई स्रोतों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा चुका है. लगभग सभी स्थानों पर पानी में सल्फर यानी गंधक की मात्रा अधिक मिली है. पर छात्रा ने यह भी सुन रखा था कि गंधक की मात्रा अधिक होने पर तालाब से उसकी गंध उठती है और पानी का तापमान भी अधिक होता है. कंकालीपारा तालाब में ऐसा कुछ भी नहीं था. इसलिए उसने अपने अंदाजे की पुष्टि करने की कोशिश की. उसके पास न तो अपना लैब था और न ही उसे सैम्पल टेस्ट करना आता था. उसने इस कार्य को आउटसोर्स कर दिया. लैब से रिपोर्ट आई और उसे अपना जवाब मिल गया. कंकालीपारा तालाब में डुबकी लगाने से चर्मरोगों से मुक्ति को वैज्ञानिक समर्थन मिल गया. दरअसल, वैज्ञानिक बनने के लिए इसी दृष्टिकोण की आवश्यकता है. जो लोग विज्ञान में पीएचडी करने के बाद भी आस्था और अंधविश्वास में खोए रहते हैं, उनसे इस तरह के सवालों की उम्मीद नहीं की जा सकती. उनके लिए शोध भी उच्च शिक्षा का ही एक एक्सटेंशन मात्र है.





