वार्डों में चल रहा आयातीत प्रत्याशियों को निपटाने का खेल
भिलाई। महापौर बनने की हसरत पाले कई बड़े और नामचीन लोगों ने चुनाव लडऩे का फैसला तो कर लिया, किन्तु अब यही फैसला उनके राजनीतिक रसूख के लिए मुसीबत बन गया है। इनमें से कई ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने दीगर वार्डों से हेलीकाप्टर प्रत्याशी बनना मंजूर किया। ऐसे लोगों की उनके अपने करीबियों ने वार्डों में ही घेरेबंदी कर दी है। इसकी भनक लगने के बाद कई प्रत्याशियों की नींदें हराम हो गई है। नामांकन दाखिल हो चुका है इसलिए चुनाव लडऩे से इनकार नहीं कर सकते और वार्डों में स्वयं को हारते हुए देखना वे गंवारा नहीं कर पा रहे हैं। हालात यह है कि न चाहते हुए भी उन्हें जेबें ढीली करनी पड़ रही है। कहां तो महापौर बनने का ख्वाब पाल रहे थे और कहां पार्षद चुनाव जीतना मुश्किल हो रहा है। यह हालात दोनों दलों कांग्रेस व भाजपा के साथ समान रूप से है।
कांग्रेस और भाजपा के अनेक तोपचंदों को महापौर बनने की राह बेहद आसान लग रही थी। इसकी वजह यह है कि इस बार पार्षदों को ही महापौर चुनना है। इन तोपचंदों को लगा कि पार्षद का चुनाव आसानी से और किसी भी वार्ड से जीतकर वे थोड़ी तीन-पांच करके महापौर बन जाएंगे। इसीलिए जिन लोगों के वार्ड आरक्षण की चपेट में आए, उन्होंने आसपास के वार्डों में जुगाड़ लगाई। बड़े नेताओं की थोड़ी-बहुत मान-मनौव्वल के बाद उन्हें हेलीकाप्टर प्रत्याशी बना दिया गया। क्योंकि ऐसे तोपचंदों के पास धनबल की कमी नहीं थी, इसलिए हेलीकाप्टर प्रत्याशी होने के बावजूद वार्ड के कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ा। इसे देखकर पहली ही बार में उन्हें अहसास हो गया कि वे चुनाव बस जीतने ही वाले हैं। लेकिन अब जब वे वार्डों में घूम रहे हैं, दाल-आटे का भाव भी समझ में आने लगा है। बताया जाता है कि कई हेलीकाप्टर प्रत्याशियों को दीगर वार्डों से पहुंचने वाले लोग अपना समर्थन जता रहे हैं। प्रत्याशियों को अब महसूस हो रहा है कि बाहरी लोगों के जुडऩे से जीत हासिल नहीं हो पाएगी। इसलिए वार्ड के पुराने कार्यकर्ता की धरपकड़ कर उन्हें समझाने और मनाने का उपक्रम चल रहा है।
इधर, एक और समस्या यह है कि निपटो-निपटाओ के खेल में कांग्रेस प्रत्याशी भाजपा के बागी को तो भाजपा प्रत्याशी कांग्रेस के बागी को समर्थन देकर वोट कटवाने में तुले हैं। इसका सबसे ज्यादा नुकसान हेलीकाप्टर प्रत्याशियों को ही हो रहा है। बताते हैं कि आयातीत प्रत्याशियों से वार्ड के कार्यकर्ता खुद खार खाए बैठे हैं। ऐसे में उनके जीतने की संभावना वैसे भी कम है। श्रीकंचनपथ की टीम ने कई वार्डों का दौरा किया, जहां से नामचीन नेता दीगर वार्डों से लड़ रहे हैं। लगभग सभी स्थानों पर एक तरह का ही माहौल देखने को मिला। एक वार्ड में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक नेता का विरोध करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी को समर्थन दे दिया है। वहीं एक अन्य वार्ड में कांग्रेस के आयातीत धनपति प्रत्याशी के खिलाफ स्थानीय कार्यकर्ताओं में आक्रोश है। अब उक्त धनपति प्रत्याशी धनबल के जरिए कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में लगा है। भाजपा के कुछ नेता तो महापौर बनने के लिए ही पार्षद चुनाव लड़ रहे है। अब उसे अपनी भावी पराजय की चिंता सता रही है। मजे की बात तो यह है कि ऐसे लोगों ने कभी सांसद से लेकर विधायक व महापौर तक के लिए टिकट मांगे थे। अब उनके लिए पार्षद चुनाव जीतना ही मुश्किल हो रहा है।




