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गुस्ताखी माफ:12वीं के छात्र की खुदकुशी से उठे सवाल

By @dmin
Published: August 2, 2022
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गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
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-दीपक रंजन दास
श्री शंकरा विद्यालय सेक्टर-10 के एक छात्र ने खुदकुशी कर ली। वह गणित विषय के साथ 12वीं का छात्र था। उसने अपार्टमेंट हाउस की पांचवी मंजिल से छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। जहां से उसने छलांग लगाई वहां से उसका स्कूल बैग मिला। उसकी जेब से चार पन्ने का एक सुसाइड नोट भी मिला है। उसने लिखा है कि वह काफी कोशिश करने के बाद भी अच्छा परफार्म नहीं कर पा रहा है। उसे डरावने सपने आते हैं। खून के प्यासे भूत उसे सपने में डराते हैं। उसने अपने मोबाइल और लैपटॉप का पासवर्ड भी इन पन्नों पर अंकित किया है। कुछ दिन पहले उसे गुमसुम देखकर उसकी टीचर उसे वाइस प्रिंसिपल के पास लेकर गई थी। उसने वाइस प्रिंसिपल को बताया था कि टेस्ट में अच्छा नहीं कर पाने के कारण वह टेंशन में है। उसकी काउंसलिंग भी की गई थी। छात्र ने सुसाइड नोट में लिखा है कि वह पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पा रहा है। वह स्कूल नहीं जाना चाहता। सीखने के और भी तरीके हैं पर उसे समझ में नहीं आ रहा का क्या किया जाए। वारदात के दिन भी वह स्कूल नहीं गया था। देर से सोकर उठा और फिर बैग लेकर ट्यूशन के लिए निकला था। कुल मिलाकर मामला अधकचरी काउंसलिंग और स्ट्रेस दिखने के बावजूद समय पर सही कदम नहीं उठाने का है। दरअसल 11वीं-12वीं के वो विद्यार्थी जो मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे हैं, असामान्य दबाव से गुजर रहे हैं। स्कूल और कोचिंग मिलाकर दिन के 12 से 14 घंटे वो क्लास में होते हैं। इसके बाद घर पर पढ़ाई और होमवर्क पूरा करने में 2 से 3 घंटे और लग जाते हैं। अधिकांश पेरेन्ट्स इस स्ट्रेस को समझ नहीं पाते। स्कूलों में भी प्रशिक्षित काउंसलर नहीं रखे जाते। लोग अपने अपने हिसाब से काउंसलिंग करते हैं जिनका मनोविज्ञान से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता। ऊपर से मोटिवेटर रोज लेक्चर झाड़ जाते हैं कि यदि कोई और कर सकता है तो आप भी कर सकते हो। घर वाले भी तमाम रिश्तेदारों और जान पहचान वालों के होनहार बच्चों का उदाहरण देकर प्रेशर बनाते हैं। दिन रात पीसीएम, पीसीबी करते करते एक समय बच्चे का मस्तिष्क शून्य हो जाता है। यद्यपि यह स्थिति खतरनाक है पर इससे बचा जा सकता है। सही समय पर स्ट्रेस की पहचान कर उसे दूर करने के प्रयास किये जा सकते हैं। प्रफेशनल काउंसलर्स की मदद ली जा सकती है। इसे स्टूडेन्ट्स बर्नआउट सिंड्रोम भी कहते हैं। बच्चा अच्छा करना चाहता है, अत्यधिक मेहनत करता है, मस्तिष्क साथ नहीं देता और परफारमेंस गिरता चला जाता है। इसके बाद आता है फ्रस्ट्रेशन और फिर बच्चा विद्रोह कर देता है। यही आत्महत्या का कारण भी बनता है। इसे समझने की जरूरत है।

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