-दीपक रंजन दास
माना के एक बालाश्रम में एक किशोरी से हुए बलात्कार के मामले में नित नए खुलासे हो रहे हैं. अब तक मिली खबरों के मुताबिक जून 2021 में 14 वर्षीय किशोरी से बलात्कार किया गया. इसकी पर्ची थाने के टेबलों पर घूमती रही. नवंबर 2021 में इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई. किशोरी ने आश्रम के ही एक कर्मचारी का नाम लिया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. इधर किशोरी ने एक मृत शिशु को जन्म दिया. शिशु और आरोपित के डीएनए मैच नहीं करते. मतलब साफ है कि या तो किशोरी ने गलत शिनाख्त की है या फिर उसका दैहिक शोषण करने वालों की संख्या एक से अधिक है. ताज्जुब का विषय तो यह है कि दिन भर ब्रेकिंग चलाने वाली मीडिया तक को इस घटना की कोई भनक नहीं लगी. तब भी नहीं जब इसका एफआईआर दर्ज हो गया. ऐसा क्यों हुआ होगा, इसका जवाब उतना कठिन भी नहीं है. यह कोई सरकारी बालाश्रम नहीं है जहां से अखबारों को सिर्फ खबरें ही मिलती हों. यह बालाश्रमों का एक पूरा गांव है. इसका संचालन एसओएस चिल्ड्रन्स विलेज चलाने वाली संस्था करती है. इस संस्था का जन्म ऑस्ट्रिया में हुआ. 1964 में संस्था ने भारत में काम करना शुरू किया और आज देश भर में उसकी 32 से अधिक शाखाएं हैं. 7000 से अधिक अनाथ और निराश्रित बच्चों को यहां शरण मिली हुई है. इनकी परवरिश एक उपमाता करती है जिसका चुनाव संस्था द्वारा किया जाता है. एक घर में 10 से 15 बच्चे रहते हैं. एक गांव में इस तरह के 10 से 15 घर होते हैं. इनका खर्च देश विदेश से दान में मिली रकम से चलता है. संस्था की वेबसाइट पर डोनेशन के लिंक उपलब्ध है. ऊपर से देखने पर यह एक असहाय, अनाथ और बेसहारा बच्चों की परवरिश का एक बेहद खूबसूरत सेटअप नजर आता है, पर ऐसा है नहीं. संचालकों के पास अकूत दौलत है. जिस देश में दौलत का नशा सिर चढ़कर बोल रहा हो, वहां थाने में रिपोर्ट दबाने से लेकर अखबारों का मुंह बंद करवाने तक का काम सरलता के साथ किया जा सकता है. फिल्मों को समाज का आईना भी कहा जाता है. हर दूसरी फिल्म किसी न किसी सच्ची घटना से प्रेरित बताई जाती है. फिल्मों में कई बार बालाश्रमों और नारी निकेतनों को वासना के पुजारियों की अय्याशी का अड्डा बताया जा चुका है. एसओएस विलेज माना में हुई घटना यह संभावना भी प्रस्तुत करती है कि अऩ्यान्य किशोरियों के साथ भी यह हुआ होगा. कहां तो मामला पाक्सो के तहत दर्ज होता और आरोपियों की दनादन गिरफ्तारी से लेकर आश्रम की ईंटें हिला दी जातीं, किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी या नहीं रेंगने दी गई. लोग अपनी सहूलियत के अनुसार काम करते रहे. एक अदना आरोपी की गिरफ्तारी की गई और उसके खिलाफ भी आरोप के सिवा कोई सबूत नहीं. क्या फायदा पाक्सो का?
गुस्ताखी माफ: बालाश्रम में दब गई किशोरी की चीख




