-दीपक रंजन दास
आधुनिक काल में गुरू केवल मंत्र दीक्षा देते हैं. उनकी गोलमोल बातें अधिकांश शिष्यों की समझ में नहीं आती. इनके लाखों शिष्य या अनुयायी होते हैं. पर गुरू मंत्र या मंत्र दीक्षा का किसी के जीवन पर कोई खास प्रभाव पड़ता नहीं दिखाई देता. शिक्षक वह है जो स्कूल-कालेजों का पाठ्यक्रम पढ़ाता है. इनमें से कुछ लोगों ने खुद को गुरू घोषित कर रखा है. कोई इस विषय का गुरू है तो कोई उस विषय का. विद्यार्थी इनकी सहायता से पाठ्यक्रम का अभ्यास करता है और परीक्षाएं उत्तीर्ण करता है. पर इस भीड़ में कुछ शिक्षक ऐसे भी होते हैं जो विद्यार्थियों के दिलों में अपनी जगह बना लेते हैं. ऐसे शिक्षकों को कोई भूल नहीं पाता. उनका सान्निध्य प्राप्त करने के लिए छात्र हमेशा लालायित रहते हैं. दोनों का परस्पर संबंध इतना प्रगाढ़ होता है कि वे एक दूसरे का सुख-दुख महसूस कर सकते हैं. इन सबसे अलग होता है मित्र. मित्र वह जो आपको पूरा का पूरा स्वीकार करता है. आपकी सभी खामियों एवं खूबियों के साथ. कदाचित मित्र ही आपको सही सलाह दे पाता है क्योंकि उसे न तो आपसे कोई लाभ चाहिए और न ही वह आपसे मिलने वाली भत्र्सना की कोई परवाह करता है. वह आपकी कमियों को गिनाता है और समय पडऩे पर आपकी खूबियों को आपकी ताकत में बदल देता है. अर्जुन ने गुरूकुल में वह सबकुछ सीखा जो उसके गुरू उसे सिखा सकते थे. वह अपने समय का श्रेष्ठ धनुर्धर बना. किन्तु कुरुक्षेत्र की रणभूमि में वह किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो गया. उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. तब उसके घनिष्ट मित्र श्रीकृष्ण ने उसे गीता का ज्ञान दिया. उसे बताया कि युद्ध भूमि में भावुक होना किसी योद्धा को शोभा नहीं देता. यहां युद्ध करना ही उसका धर्म है. कुछ ऐसा ही त्रेता में हनुमान के साथ हुआ. हनुमान में असीम बल था. नटखट बाल हनुमान ने ऋषियों की नाक में दम कर दिया. परेशान होकर ऋषियों ने उन्हें श्राप दे दिया. वे अपना बल, कला और कौशल भूल गए. जामवंत ने उन्हें उनके बल का स्मरण कराया और फिर हनुमान ने इतिहास रच दिया. श्रेष्ठ गुरू मित्र होता है. कुछ ऐसा ही है रामेश्वर गुरूजी का जीवन. कला साहित्य की श्रीहीन उपाधियां प्राप्त करने वाले शिक्षक रामेश्वर दिव्यांग भी हैं. उनकी दिव्यांगता का कारण भी गरीबी ही है. स्कूल पहुंचना उनके लिए एक बड़ी चुनौती है पर विद्यार्थी उन्हें स्वयं उठाकर ले जाते हैं. रामेश्वर अपने अभाव ग्रस्त जीवन में खुश हैं. वे सम्मान के भूखे नहीं हैं. फ्रांस की एक संस्था उनका सम्मान करना चाहती थी पर उन्होंने इंकार कर दिया. उन्होंने शासन के दिव्यांग वाहन का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया. मुफ्त सरकारी राशन को वे पर्याप्त मानते हैं. उनकी जीवन विद्यार्थियों को समर्पित है.





