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आंदोलन के 111वें दिन प्रदर्शनकारियों ने भरी हुंकार, बोले- कोयला खदानें बंद होने तक पीछे नहीं हटेंगे

By @dmin Published June 27, 2022
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आंदोलन के 111वें दिन प्रदर्शनकारियों ने भरी हुंकार, बोले- कोयला खदानें बंद होने तक पीछे नहीं हटेंगे
आंदोलन के 111वें दिन प्रदर्शनकारियों ने भरी हुंकार, बोले- कोयला खदानें बंद होने तक पीछे नहीं हटेंगे
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रायपुर। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खदान परियोजनाओं को मंजूरी देने के खिलाफ इस साल मार्च से ही विरोध-प्रदर्शन चल रहा है। सरगुजा जिले के ग्रामीण भीषण गर्मी के बावजूद अपना विरोध-प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं और अब वे मानसून की बारिश में भी अपने विरोध को जारी रखने के लिए तैयार हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कोई उनके मनोबल को डिगा नहीं सकता क्योंकि वे अपनी जमीन के लिए लड़ाई रहे हैं, जहां पर वे पीढिय़ों से रह रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगें नहीं मान ली जाती, तब तक वे अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे। सरगुजा जिला मुख्यालय अंबिकापुर से 60 किलोमीटर दूर हरिहरपुर गांव में तीन कोयला खदानों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन रविवार को 111वें दिन में प्रवेश कर गया।

हालांकि, राज्य सरकार ने इन तीन कोयला खदान परियोजना से संबंधित सारी प्रक्रियाएं रोक दी हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी इस परियोजना को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं। ये खदान राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को आवंटित किए गए हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की इस साल मार्च में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात के बाद राज्य सरकार ने सरगुजा और सूरजपुर जिलों की 841.538 हेक्टेयर वन भूमि परसा खदान के लिए और सरगुजा जिले में पीईकेकेबी फेज-ढ्ढढ्ढ खदान के लिए 1,136.328 हेक्टयर जमीन का इस्तेमाल गैर वानिकी कार्य के लिए करने की अनुमति दी थी। वहीं, आरआरवीयूएनएल को हसदेव अरंद क्षेत्र में आवंटित केंटे एक्सटेंशन कोयला खदान पर जनसुनवाई लंबित है।

पिछले साल अक्तूबर में क्षेत्र के ग्रामीणों ने सरगुजा से राजधानी रायपुर तक 300 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर प्रस्तावित खदान के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया था।इस प्रदर्शन के बाद भी जब राहत नहीं मिली तो परियोजना से प्रभावित साल्ही, फतेहपुर, हरिहरपुर और घाटबर्रा गांव के निवासियों ने हरिहरपुर में डेरा डाल दिया और अनिश्चिकालीन प्रदर्शन शुरू कर दिया। हरिहरपुर प्रदर्शन का केंद्र बन गया है, जहां पर प्रदर्शनकारी सूखा राशन अपने-अपने घरों से लाते हैं और प्रदर्शन स्थल पर ही खाना पकाकर साथ खाते हैं। साल्ही गांव के निवासी रामलाल करियाम ने कहा,” हम पीढिय़ों से यहां रह रहे हैं और जंगलों को संरक्षित कर रहे हैं। हमारी जिंदगी इस पर निर्भर है। हम सरकार से बस इतना चाहते हैं कि कोयले के लिए वह इसे नष्ट नहीं करे।ÓÓ

करियाम स्थानीय लोगों के समूह हसदेव अरंद बचाओ संघर्ष समिति का हिस्सा है। उनके परिवार में नौ सदस्य हैं, जिनमें उनके तीन बच्चे शामिल हैं, जो एक-एक कर प्रदर्शन में हिस्सा लेते हैं। उन्होंने कह कि गर्मी हो या बरसात वे मांगें पूरी होने तक प्रदर्शन स्थल को खाली नहीं करेंगे। घाटबर्रा गांव के सरपंच जयनंदन पोर्टे ने भी इसी तरह की भावना व्यक्त की और सवाल किया कि सरकार क्यों पर्यावरण और वनवासियों के जीवन से खेल रही है। उन्होंने कहा, ”सरकार ने खदान का काम रोक दिया है लेकिन ऐसा लगता है कि महज प्रदर्शन को शांत करने की कोशिश है। हम चाहते हैं कि दी गई मंजूरी को रद्द किया जाए।ÓÓ प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि पीईकेबी फेज-ढ्ढढ्ढ और परसा खदान को ग्राम सभा के फर्जी सहमति दस्तावेज के आधार पर मंजूरी दी गई।

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@dmin June 27, 2022
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