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पाटन से चाचा-भतीजे की जोड़ी चौथी बार आमने-सामने… सीएम भूपेश को बांधने की रणनीति में कितना कामयाब होगी भाजपा?

By Mohan Rao
Published: August 17, 2023
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श्रीकंचनपथ की खबर पर भाजपा आलाकमान की मुहर

भिलाई। भाजपा केन्द्रीय चुनाव समिति की कल देर रात दिल्ली में हुई बैठक के बाद आज दोपहर छत्तीसगढ़ के 21 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी गई। इस सूची में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्वाचन क्षेत्र पाटन से सांसद विजय बघेल को मैदान में उतारा गया है। यह चौथा अवसर होगा, जब चाचा-भतीजे की यह जोड़ी विधानसभा चुनाव में आमने-सामने होगी। ‘श्रीकंचनपथ’ ने अपने 9 अगस्त के अंक में इस खबर को ”सीएम भूपेश के खिलाफ विजय बघेल को चुनाव लड़वा सकती है पार्टी, भाजपा से मिले संकेत” शीर्षक से प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इसी खबर में इस बात का भी उल्लेख था कि भाजपा अपने सांसदों, पूर्व सांसदों और वरिष्ठ नेताओं को भी मैदान में उतारने की तैयारी में है। पार्टी आलाकमान द्वारा जारी सूची में इस खबर की पुष्टि होती है।

उल्लेखनीय है कि भूपेश बघेल व विजय बघेल विधानसभा चुनाव में तीन बार आमने-सामने हो चुके है। 2003 में विजय बघेल ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बैनर तले भूपेश के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में विजय बघेल को पराजय मिली थी। इसके बाद 2009 में विजय बघेल भाजपा की टिकट पर प्रत्याशी थे। इस चुनाव में पहली बार उन्होंने जीत हासिल की और विधानसभा पहुंचे। 2013 में एक बार फिर चाचा-भतीजे की यह जोड़ी आमने सामने थी, लेकिन इस बार विजय बघेल को एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा। 2018 के चुनाव में भाजपा ने जातीय समीकरणों के मद्देनजर मोतीलाल साहू को प्रत्याशी बनाया था।

विजय बघेल वर्तमान में कुर्मी समाज के प्रदेश अध्यक्ष हैं और उन्हें समाज का भरपूर समर्थन भी हासिल है। ऐसे में पाटन में इस बार का मुकाबला दिलचस्प होने की पूरी संभावना है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा, सीएम भूपेश बघेल को पाटन के खुंटे में बांधने में कामयाब हो पाएगी? दरअसल, 2018 के चुनाव में भूपेश बघेल ने पाटन से प्रत्याशी रहते हुए पूरे प्रदेश में जोरदार और आक्रामक प्रचार किया था। इस चुनाव में उनके सामने भाजपा ने मोतीलाल साहू को प्रत्याशी बनाया था, जिन्हें अपेक्षाकृत कमजोर माना गया था। शायद इसीलिए इस बार पार्टी ने भूपेश बघेल को अपने क्षेत्र तक सीमित रखने की रणनीति बनाई है। जाहिर तौर पर भाजपा के पास विजय बघेल से बड़ा चेहरा जिले में नहीं है।

2018 और वर्तमान चुनाव में एक बड़ा अंतर यह भी है कि इस बार भूपेश बघेल प्रत्याशी नहीं हैं बल्कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री मैदान में हैं। ऐसे में भाजपा के लिए यहां से मजबूत प्रत्याशी देना बड़ी चुनौती थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने विजय बघेल को लोकसभा का प्रत्याशी बनाकर बड़ा दांव खेला था और यह दांव कामयाब भी रहा। क्षेत्रानुसार आंकलन करें तो विजय बघेल वर्तमान में जिले के सभी 6 विधानसभा क्षेत्रों के साथ ही 3 अन्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। शायद यही वजह है कि पार्टी ने उन्हें बड़े और चुनौतीपूर्ण मुकाबले के लिए चुना है।

बहरहाल, गुरूवार सुबह से ही यह खबर आ रही थी कि दिल्ली में हुई पार्टी की बैठक में काफी कुछ हुआ है। दोपहर होते-होते छत्तीसगढ़ से 27 प्रत्याशियों के नाम फायनल होने की भी जानकारी मिली, किन्तु दोपहर में ही पार्टी ने 21 नामों का ऐलान कर दिया। इस सूची को देखें तो ज्यादातर नए चेहरों को मौका दिया गया है। 21 प्रत्याशियों की इस सूची में सबसे बड़ा नाम रामविचार नेताम का है, जो छत्तीसगढ़ में केबिनेट मंत्री और केन्द्र में राज्यमंत्री के ओहदे पर रह चुके हैं। अभी कुछ महीनों पहले ही राज्यसभा से उनका कार्यकाल खत्म हुआ था। उनके बाद दूसरा बड़़ा चेहरा दुर्ग के सांसद विजय बघेल का है।

इतनी हड़बड़ी में क्यों है भाजपा
अभी विधानसभा चुनाव को करीब 3 महीने का वक्त शेष है। निर्वाचन आयोग ने चुनाव की घोषणा भी नहीं की है, बावजूद इसके भाजपा के अंदरखाने लगातार चल रही बैठकें यह सवाल जरूर उठाती हैं कि आखिर पार्टी को इतनी जल्दी क्या है? दरअसल, एक-एक कर कई राज्य हाथ से फिसलने के बाद भाजपा को नई रणनीति अपनानी पड़ी है। कांग्रेस ने कुछ समय पहले कर्नाटक चुनाव में इसी तरह का प्रयोग किया था, जो कामयाब भी रहा और वहां कांग्रेस अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई। इसी के मद्देनजर भाजपा ने भी कर्नाटक फार्मूले को अपनाया है। भाजपा के भीतर से जो खबरें आ रही है, उसके मुताबिक, सितम्बर के मध्य तक पार्टी ज्यादातर सीटों पर प्रत्याशियों का ऐलान कर सकती है। जानकारों का मानना है कि जिन 21 प्रत्याशियों की सूची जारी की गई है, उनमें ज्यादातर नए चेहरे है। ऐसे में इन चेहरों को चुनाव की तैयारियों और प्रचार आदि के लिए भरपूर वक्त मिल पाएगा। चुनावी रणनीति भी बनाने को काफी समय होगा। 21 प्रत्याशियों का ऐलान कर वास्तव में भाजपा ने सत्तारूढ़ दल से लीड हासिल कर ली है।

अपनी चलाने में काफी कुछ कामयाब रहे डॉ. रमन
पिछले एक पखवाड़े में पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के शीर्ष नेताओं के साथ कई बार बैठकें की और यह बैठकें काफी लम्बी भी चली। इन सभी बैठकों में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. रमन सिंह मौजूद रहे। बुधवार को देर रात तक चली केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक में भी डॉ. रमन उपस्थित थे। भले ही पार्टी ने संगठन और निजी एजेंसियों से करवाए गए सर्वे की रिपोर्ट सामने रखकर नाम तय किए हैं, किन्तु प्रत्याशियों के नाम तय करने में डॉ. रमन की भूमिका को भी कमतर नहीं आंका जा सकता। डॉ. रमन को पार्टी ने इस बार सीएम के लिए प्रोजेक्ट नहीं किया है, जबकि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर चुनाव लडऩे की बात कही गई है। जानकारों की मानें तो पार्टी ने कुल 4 श्रेणियां तय की थी। इनमें से ए कैटेगरी में उन सीटों को शामिल किया गया, जहां भाजपा ने हर बार चुनाव जीता है। वहीं बी कैटेगरी में उन सीटों का नाम था, जहां पार्टी को जीत और हार दोनों मिली। इसी तरह सी कैटेगरी में उन सीटों को रखा गया, जहां पार्टी कमजोर है। अंत में डी कैटेगरी की सीटों को रखा गया, जहां भाजपा ने कभी जीत हासिल नहीं की।

क्या भाजपा के लिए कमजोर है पाटन सीट?
पार्टी के जानकारों का मानना है कि पहली सूची में जिन क्षेत्रों से प्रत्याशी उतारे गए हैं, वहां भाजपा कमजोर हालत है। ऐसे में यह भी माना जा सकता है कि पार्टी ने सीएम भूपेश बघेल के निर्वाचन क्षेत्र पाटन को अपने लिए कमजोर या बेहद चुनौतीपूर्ण सीट माना है और यही वजह है कि यहां से अपने सबसे बड़े चेहरे को मैदान में उतारा है। हालांकि प्रत्याशी चयन में इस बार सबसे ज्यादा जातीय समीकरणों को ध्यान में रखा गया है। सीएम भूपेश के खिलाफ विजय बघेल पार्टी की नजरों में हर तरह से सटीक माने गए।

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