राजिम। माघ पुर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक चलने वाली 15 दिवसीय राजिम मेला में श्रद्धालुगण अपने छोटे बालक, बालिकाओं का मुंडन संस्कार कर रहे है। संगम नदी में कुलेश्वरनाथ महादेव मंदिर के पास आकर मंुड़न संस्कार का कार्यक्रम सम्पन्न हो रहे है। उल्लेखनीय है कि लोगों की श्रद्धा त्रिवेणी संगम में कुट-कुट कर भरी हुई है। इन्हें धर्मक्षेत्रे प्रयाग, हरिद्वार, गया, कांची, काशी, कावेरी की भांति पवित्र माना जाता है। जिस तरह प्रयाग में गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदी का संगम है। उसी भांति राजिम संगम में सोंढूर, पैरी और महानदी का संगम होता है। इन्हें छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है। धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक शिशु के मस्तिष्क को पुष्ट करने, बुद्धि में वृद्धि एवं गर्भावस्था के अशुद्धियों को दुर कर मानवता वादी आसाओं को प्रतिस्थापित करने के लिए मुंड़न संस्कार किया जाता है। बताया जाता है कि मुंडन कराने से बच्चों के शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है, जिससे दिमाग व सिर ठण्डा रहता है। हिन्दू धर्म में हर कोई अपने रितियों के अनुसार जन्म और मरण के संस्कारों का करता है। इसी तरह मुंडन संस्कारों की परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह मनुष्य जीवन में 16 संस्कारों में से एक है। प्रतिदिन बड़ी संख्या महिलायें गोद में बच्चे को लेकर मुंडन करा रहीं है। बलौदा-बाजार, महासमुंद, कसडोल, बेमेतरा, राजनांदगांव, कोण्डागांव, भिलाई से पहुंचे श्रद्धालुओं ने बताया की हमारे परिवार में प्रत्येक सदस्यों का जन्म के बाद प्रथम मुंडन राजिम संगम में ही कराते हैं।





