बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भिलाई में एक होटल संचालक पर बिना एफआईआर कार्रवाई को लेकर बड़ा एक्शन लिया है। हाईकोर्ट ने इस मामले में पुलिस कार्रवाई को गलत माना और एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट ने सरकार को भी छूट दी है कि दोषी पुलिस कर्मियों की तनख्वाह से भी रुपए काट सकते हैं। यदि जुर्माने की रकम देने में देरी हो तो 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज में देने का निर्देश दिया है।

दरअसल यह पूरा मामला अंवतिबाई चौक कोहका स्थित एक होटल से जुड़ा है। होटल संचालक आकाश कुमार साहू को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। इसके बाद आकाश साहू ने अपने वकील के माध्यम से गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका के माध्यम से अशोक साहू ने बताया कि 8 सितंबर 2025 को पुलिस अधिकारी और जवान उनके होटल में पहुंचे। इस दौरान होटल में ठहरे लोगों से पूछताछ करने के नाम पर रजिस्टर और पहचान दस्तावेजों की जांच की। इसके बाद एक कमरे में जबरदस्ती घूस गए, जहां पुरूष और महिला ठहरे थे। उन्हें कमरे से बाहर लाया गया। इस दौरान मैनेजर के साथ दुर्व्यवहार धमकी देकर चले गए।
आकाश साहू ने बताया कि कुछ समय बाद पुलिस अफसर और जवान फिर से होटल पहुंच गए। इस दौरान होटल कर्मचारियों द्वारा सोने के आभूषणों की चोरी का झूठा आरोप लगाया। पुलिस अफसर कमरों की तलाशी लेने पहुंच गए। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जब वो होटल पहुंचा तो उसने पुलिस अफसरों को संस्थान के मालिक होने की जानकारी दी। इतना सुनते ही पुलिस अफसर भड़क गए और उसके साथ गाली-गलौज करते हुए दुर्व्यवहार कर अपमानित करने लगे। उसके विरोध करने पर उसे जबरिया हिरासत में लेकर थाने ले जाया गया, जहां उसके साथ मारपीट कर अभद्रता की गई। फिर बाद में बिना किसी वैध कारण के गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
हाईकोर्ट ने कार्रवाई को गलत माना
इस मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी संज्ञेय अपराध के तहत कोई एफआईआर दर्ज नहीं थी। महज संदेह और कहासुनी के आधार पर जेल भेजना असंवैधानिक है। हाईकोर्ट ने इस मामले में पुलिस के साथ ही एसडीएम यानी सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। मजिस्ट्रेट को न्यायिक प्रहरी होना चाहिए था, लेकिन उन्होंने बिना दिमाग लगाए पुलिस की रिपोर्ट पर मुहर लगा दी और युवक को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई सभी आपराधिक कार्रवाई और पुलिस के इस्तगासा को निरस्त कर दिया है। राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि 4 सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को 1 लाख रुपए का भुगतान करे। सरकार को यह छूट दी है कि वह यह राशि जांच के बाद दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूल सकती है। भुगतान में देरी होने पर राशि पर 9% वार्षिक ब्याज देना होगा।




