नई दिल्ली (एजेंसी)। देश में कोरोना के मामले 16 लाख के पार पहुंच चुके हैं। अधिकतर हर शहर के अस्पताल में बेड भरे हुए हैं और ऑक्सीजन नहीं है। हालात इतने ज्यादा खराब हैं कि मरीजों का इलाज सड़क पर हो रहा है तो काफी लोग ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ चुके हैं। ऐसे में ऑक्सीजन की किल्लत को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपात बैठक की, जिसमें 50 हजार मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन आयात करने की योजना बनाई गई। इस रिपोर्ट में हम जानते हैं कि किन-किन राज्यों में ऑक्सीजन की किल्लत है और क्यों इसका ट्रांसपोर्टेशन मुश्किल है?

ऑक्सीजन की कमी से ये राज्य बेहाल
बता दें कि महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान आदि राज्यों में ऑक्सीजन की काफी किल्लत हो गई है। महाराष्ट्र में तो मेडिकल ऑक्सीजन की मांग राज्य में कुल ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता से भी ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ऑक्सीजन की आपूर्ति देने की सार्वजनिक मांग की थी। हालात इतने ज्यादा बिगड़ते जा रहे हैं कि काफी लोगों की मौत समय पर ऑक्सीजन न मिलने की वजह से हो गई।
क्यों आसान नहीं ऑक्सीजन का ट्रांसपोर्टेशन?
गौरतलब है कि देश के अधिकतर राज्यों में ऑक्सीजन का उत्पादन होता है, जो खपत के हिसाब से सामान्य रहता है। हालांकि, अब हालात इतर हैं। अधिकतर राज्यों में मेडिकल ऑक्सीजन की कमी है। ऐसे में इसके ट्रांसपोर्टेशन की मांग उठी, लेकिन इसमें कई तकनीकी समस्याएं बताई गईं। जानकारी के मुताबिक, भारत में मेडिकल ऑक्सीजन के ट्रांसपोर्टेशन के लिए 24 घंटे और सातों दिन सड़क परिवहन सुनिश्चित करने वाले पर्याप्त क्रायोजेनिक टैंकर नहीं हैं। ऐसे में जब ऑक्सीजन को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाया जा रहा है तो इसके निर्माता से मरीज तक पहुंचने का समय तीन से पांच दिन की जगह छह से आठ दिन तक हो जाता है।
इस वजह से बढ़ रही लागत
छोटे आपूर्तिकर्ताओं का कहना है कि पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध कराने के लिए उनके पास पर्याप्त जंबो और ड्यूरा सिलेंडर नहीं हैं। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत बढऩे से सिलेंडर की रिफिलिंग भी महंगी हो गई है। पहले एक सिलेंडर की रिफिलिंग में 100 से 150 रुपये लगते थे। अब उसकी कीमत 500 से दो हजार रुपये तक हो गई है।
ऐसे निकाला जा रहा तोड़
बता दें कि अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति बरकरार रखने के लिए बड़े-बड़े भंडारण टैंक बनाए जा रहे हैं। अस्पताल के अधिकारियों का कहना है कि इससे कम से कम 10 दिन तक ऑक्सीजन की कमी नहीं होगी। गौरतलब है कि पिछले एक साल के दौरान कई सिविल अस्पतालों में सिलेंडरों के इंतजार से बचने के लिए जंबो टैंकर बनाए गए हैं। वहीं, मध्यप्रदेश में लोहे, स्टील और कांच उद्योग के लिए ऑक्सीजन का उत्पादन करने वालों से भी मेडिकल ऑक्सीजन तैयार कराई जा रही है।




