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जिला अस्पताल दुर्ग के मातृ-शिशु जचकी वार्ड में गंदगी का साम्राज्य

By @dmin
Published: March 13, 2020
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चुहा-काक्रोच सहित अन्य जानलेवा खतरनाक कीड़े नवजात शिशुओं और माताओं को पहुंचा रहें है नुकसान?
इस गंदगी के कारण हो सकती है नवजात शिशुओं की मौत?

दुर्ग। एक तरफ जहां पूरे देश के भीतर कोरोना वायरस की धूम मची हुई है इसे लेकर केन्द्र और राज्य सरकार के द्वारा सतर्कता बरती जा रही है। वहीं जिला अस्पताल दुर्ग में अपने ही कर्मचारियों और अधिकारियों के लापरवाही के कारण संवेदनशील शिशु जचकी वार्ड में गंदगी का साम्राज्य छाया हुआ है। जिसकी जानकारी स्थानीय प्रबंधक को होने के बावजूद अब तक गंदगी की सफाई के लिए कोई उचित उपाय नहीं किए गए है। छत्तीसगढ़ की सत्ता में कांग्रेस के पदस्थ होते ही जिला अस्पताल को एक नए स्वरूप प्रदान करते हुए शिशु जचकी वार्ड के रूप में 100 बिस्तर वाले अस्पताल का उद्घाटन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के द्वारा कर मरीजों को सौंपा गया। हालांकि एक ऊंचे स्तर पर 100 बिस्तर अस्पताल का निर्माण किया गया। जहां शासन द्वारा सारी सुविधाएं प्रबंधकों के माध्यम से जनता को सौंपी गई परन्तु इस वार्ड में पूर्व की तरह आज भी गंदगी व्याप्त है। जिस तरह से व्यवस्था को सुधारते हुए एक नई सौगात छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा जनता को सौंपा गया आज उसकी देखभाल स्थानीय प्रबंधक द्वारा नहीं किया जा रहा है।

अतिसंवेदनशील वार्ड भी गंदगी के दलदल में ?
चूंकि यह वार्ड अतिसंवेदनशील है इसलिए यहां साफ-सफाई भी आवश्यक रूप से होनी चाहिए परन्तु एैसा देखने को कहीं भी नहीं मिल रहा है। चार मंजिलों वाला यह वार्ड सिर्फ शिशुओं की देखभाल और उनके उचित इलाज के लिए बनवाया गया है। परन्तु प्रबंधकों की लापरवाही और स्थानीय पदस्थ कर्मचारियों की मनमानी के कारण यह वार्ड गंदगी के दलदल में फंसा हुआ है। नीचे से लेकर ऊंपर तक के मंजिल में वार्डो के भीतर धूल और रेत का गुबार आसानी से देखा जा सकता है। जिसे एक बार शायद सुबह साफ कर दिया जाता है उसके बाद दिन भर धूल और रेत का साम्राज्य अस्पताल के भीतर आसानी से देखने को मिल जाएगा।

काक्रोच और चूहे मौजूद है वार्ड के भीतर ?
जचकी वार्ड और शिशुओं के बिस्तर व उनके आलमारियों में काक्रोच और चूहे सहित अन्य कीड़े मकोड़े आसानी से कभी भी देखे जा सकते है। कई मरीजों ने इस भयानक दृश्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि चूहे बच्चों के नाजुक अंगों को कुतर देते है जिसकी शिकायत स्थानीय डॉक्टरों के पास की जाती है परन्तु मामूली मरहमपट्टी कर मामले को टाल दिया जाता है। एक तरफ जहां पूरे वार्ड के भीतर साफ-सफाई आवश्यक है वहीं कर्मचारियों की मनमानी की वजह से पूरे वार्ड में बदबूदार माहौल कायम रहता है। जहां सांस लेना भी दूभर हो जाता है। जबकि वहंीं ओपीडी की तरफ साफ-सफाई और एक खुशनुमा माहौल आसानी से देखा जा सकता है। तो फिर जचकी वार्ड जो कि अतिसंवेदनशील जगह को बदबूदार क्यों रखा जाता है? क्यों यहां बार-बार अन्य अस्पतालों की तरह सफाई नहीं की जाती? धूल और मच्छरों की रोकथाम के लिए यहां दरवाजों और खिड़कियों में जाली भी नहीं लगाए गए है।

फ्रीजर तो है परन्तु पानी पीने लायक नहीं?
वार्ड के भीतर प्रबंधक के द्वारा फ्रीजर तो जरूर लगवा दिए गए है परन्तु फ्रीजर के आसपास की गंदगी को देखकर पानी पीने की इच्छा ही मर जाती है। फ्रीजर के आसपास गुटखा, पान के थूक के निशान तो वहीं बर्तनों के जूठन धोने की गंदगी को आसानी से देखा जा सकता है। मौजूद किसी भी फ्रीजर के पानी को पीना नामुमकीन सा है। खाना खाकर छोड़े हुए जुठे, फेंके हुए जुठे, धोऐ हुए जुठे सहित स्नान के पश्चात अस्पताल के भीतर कपड़ा सुखाए जाने अव्यवस्था और दरिद्रता को हमेशा देखा जा सकता है। एक तरफ जहां पूरे वार्ड के भीतर एैसी अव्यवस्था विद्वमान है तो वहीं वार्ड ब्वॉय, नर्स, आया सहित अन्य कर्मचारियों के द्वारा मरीजों और उसके परिजनों से बच्चे की पैदायशी के बाद उपहार स्वरूप दबावपूर्वक नगद पैसों की मांग की जाती है यह अस्पताल की एक परम्परा सी बन गई है जो वर्षो से संचालित किया जा रहा है। जिसकी जानकारी प्रबंधकों को है इसके बावजूद बफौती संस्कार समझ इस पूरे मामले को शिकायतों के बावजूद दबा दिया जाता है।

सच्चाई सार्वजनिक होने के बावजूद, नर्स पदस्थ
5 मार्च 2020 को इसी वार्ड के एक नर्स के द्वारा मरीज के पारिवारिक सदस्यों से नगद पैसा लेते हुए वीडियो वायरल हुआ था जिसकी जांच पड़ताल प्रबंधकों सहित डॉक्टरों के द्वारा 6 मार्च की सुबह ओपीडी के हॉल में की गई। वीडियों में प्रत्यक्ष रूप से नर्स के द्वारा रिश्वत लिए जाने के प्रसारण होने के बावजूद प्रबंधकों के द्वारा एक छोटी सी पूछताछ के पश्चात नर्स को बिना दंडित किए रख लिया गया। वहीं कुछ दिन पूर्व ही अस्पताल के भीतर मौजूद दलाल गजेन्द्र केसरी के काले कारनामें उजागर होने के बावजूद उसके आज भी अस्पताल के भीतर पदस्थ रखा गया है। एैसी कई अव्यवस्थाएं है जो अस्पताल के भीतर देखी जा सकती है। एक तरफ जहां अस्पताल प्रबंधक और पदस्थ अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही के चलते शिशु वार्ड में गंदगी के साम्राज्य को आसानी से देखा जा सकता है वहीं इस पूरे गंदगी को फैलाने व करने में जनता भी कोई कम नहीं है। जनता अपनी जिम्मेदारी को अच्छी तरह से समझते हुए के बावजूद गंदगी को अस्पताल परिसर में फैला रही है। प्रबंधक चाहे तो इस अव्यवस्था को सुधार सकती है। लेकिन खुद के हाथ लापरवाही और मनमानी के कीचड़ में फंसे होने के कारण प्रबंधक भी लाचार है।

सरकार के आदेशों की अव्हेलना?
आज भी छत्तीसगढ़ शासन के सख्त आदेशों के बावजूद दोनों शिफ्टों में डॉक्टर समय पर नहीं आ रहें है? तो वहीं सुबह 9.30 बजे तक डॉक्टर और प्रबंधकों की अपने कर्मचारियों के साथ प्रतिदिन प्रार्थना और आवश्यक मीटिंग रखी जाती है तब तक ओपीडी में मौजूद मरीज परेशानियों का सामना करते रहते है। यही हाल रजिस्टे्रशन पर्ची बनाने वाले विभाग का है जहां कर्मचारी कभी भी समय में नहीं आते, और आ भी जाते है तो पूरा स्टाफ एक साथ कभी भी कार्य क्षेत्र में मौजूद नहीं रहता। फलस्वरूप पर्ची बनाने के लिए ही है लंबी लाइनें दोनों शिफ्टों में देखी जा सकती है। ठीक यही स्थिति दवाई वितरण केन्द्र का है जहां पदस्थ महिला, पुरूष कर्मचारी अपने कार्य के प्रति न तो जिम्मेदार दिखाई देते है और न ही गंभीर। दवाई के लिए मरीजों की लंबी लाइन लगी रहती है और ये कर्मचारी अविभागीय बातें करते रहते है। सबसे बुरा हाल है पैथोलॉजी लैब का जहां सभी बीमारियों से संबंधित खून की जांच एक ही जगह पर किए जाते है, रिपोर्ट भी समय पर नहीं मिलता। दूसरे दिन या तीसरे दिन ही रिपोर्ट मिलती है। हर जांच के लिए लंबी लाईनें पैथोलॉजी के भीतर देखा जा सकता है। यहां के एक दो कर्मचारियों को ही इतना दबावपूर्वक काम सौंप दिया गया है कि उसी कर्मचारी के द्वारा जहां जांच से संबंधित बॉटल दी जाती है, मरीज का नाम उसी कर्मचारी के द्वारा रजिस्टर में दर्ज किया जाता है तो उसी कर्मचारी के द्वारा रिपोर्ट भी लिया, दिया जाता है। तो वही जांच के लिए खून निकालने के लिए कोई जिम्मेदार कर्मचारी, खून निकालते समय मौजूद नहीं रहती अपितु प्रशिक्षु विद्यार्थियों को खून निकालने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है जिन्हें कई बार मरीजों के नस तक दिखाई नहीं देते और बार-बार एक ही जगह सुई चुभाकर मरीजों को परेशान कर दिया जाता है? एैसी कई अव्यवस्थाएं है जहां अब छत्तीसगढ़ सरकार को स्वयं सचेत होकर इस समस्या का समाधान करना होगा क्योंकि पूरी अव्यवस्था स्थानीय प्रबंधक, अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही से उपजी हुई है जो वर्षो से एक परम्परा और संस्कार की तरह चली आ रही है।

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