मध्य प्रदेश/मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने अंगदान की कमी एक गंभीर चुनौती है। अनुमानों के अनुसार प्रदेश में हर साल करीब 25 हजार लोग किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत से जूझते हैं। दूसरी ओर, अंगदान की वास्तविक स्थिति जरूरत के मुकाबले बहुत कम है। वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश में कुल 281 ऑर्गन डोनर्स दर्ज हुए। इनमें 273 जीवित और सिर्फ 8 मृत दाता थे। यानी मृत व्यक्ति के अंगदान, जिसे कैडेवरिक डोनेशन कहा जाता है, की स्थिति अभी भी बेहद कमजोर है। इस समस्या की गंभीरता को एक और आंकड़ा स्पष्ट करता है। जनवरी 2018 से जून 2023 के बीच मध्य प्रदेश में केवल 25 कैडेवरिक अंगदान हुए। इसी अवधि में तेलंगाना में 883 और तमिलनाडु में 713 कैडेवरिक अंगदान दर्ज हुए। यह अंतर बताता है कि मध्य प्रदेश को इस क्षेत्र में अभी लंबा रास्ता तय करना है।
किडनी फेल होने वाले मरीजों के लिए डायलिसिस जीवन बचाने का सहारा है, लेकिन कई मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट लंबे समय में बेहतर विकल्प बन सकता है। समस्या यह है कि जरूरतमंद मरीजों की संख्या और उपलब्ध अंगों के बीच बड़ा अंतर है। यह केवल चिकित्सा व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि जागरूकता, प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक सोच से भी जुड़ा सवाल है। सबसे पहली जरूरत जागरूकता की है। आज भी बहुत से लोगों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं है कि ब्रेन-स्टेम डेथ क्या होती है और ऐसी स्थिति में अंगदान कैसे संभव होता है। सड़क दुर्घटना या ब्रेन हेमरेज जैसी घटनाओं में किसी व्यक्ति की जान बचाना डॉक्टरों की पहली प्राथमिकता होती है। लेकिन यदि डॉक्टरों द्वारा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत ब्रेन-स्टेम डेथ हो चुकी है, तो परिवार की सहमति से उसके अंग दूसरे मरीजों की जिंदगी बचा सकते हैं।
दूसरी बड़ी चुनौती भ्रम और गलत धारणाएं हैं। कई परिवारों को लगता है कि अंगदान से शरीर का अंतिम संस्कार प्रभावित होगा या धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ होगा। ऐसे भ्रम दूर करने में धर्मगुरुओं, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। जब समाज के भरोसेमंद लोग अंगदान को मानव सेवा के रूप में सामने रखेंगे, तो लोगों की सोच बदलने में मदद मिलेगी। तीसरी जरूरत अस्पतालों और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने की है। हर बड़े सरकारी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर होने चाहिए। ब्रेन-स्टेम डेथ की पहचान, परिवार से संवेदनशील बातचीत और अंगों को सुरक्षित तरीके से निकालने की प्रक्रिया के लिए प्रशिक्षित टीम जरूरी है। केंद्र की व्यवस्था में नोटो राष्ट्रीय स्तर पर अंगदान और प्रत्यारोपण के समन्वय का काम करता है और राज्यों में सोट्टो जैसी व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं। अब जरूरत इनके प्रभावी इस्तेमाल और बेहतर समन्वय की है।
चौथा कदम ग्रीन कॉरिडोर और परिवहन व्यवस्था को मजबूत करना होना चाहिए। अंगों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक बहुत कम समय में पहुंचाना पड़ता है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग, पुलिस, ट्रैफिक विभाग और अस्पतालों के बीच स्थायी समन्वय जरूरी है। मध्य प्रदेश में हाल के वर्षों में ऐसे प्रयास हुए हैं, लेकिन इन्हें प्रदेश के अधिक शहरों तक नियमित और मजबूत व्यवस्था के रूप में पहुंचाने की जरूरत है। पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण कदम है राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्पष्ट लक्ष्य। सरकार को तय करना चाहिए कि अगले तीन से पांच वर्षों में प्रदेश को अंगदान के मामले में कहां पहुंचाना है। इसके लिए हर जिले में जागरूकता अभियान, मेडिकल कॉलेजों में प्रशिक्षण, अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने और अंग परिवहन के लिए अलग कार्ययोजना बनाई जा सकती है।
तमिलनाडु और तेलंगाना का अनुभव बताता है कि मजबूत व्यवस्था, जागरूकता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से तस्वीर बदली जा सकती है। केंद्र सरकार के आंकड़ों में भी इन राज्यों का प्रदर्शन लगातार बेहतर रहा है। मध्य प्रदेश में भी बदलाव संभव है। जरूरत है कि अंगदान को केवल एक दिन के जागरूकता कार्यक्रम तक सीमित न रखा जाए। इसे स्वास्थ्य नीति का स्थायी हिस्सा बनाया जाए। हर परिवार अंगदान के बारे में जाने, हर बड़े अस्पताल में प्रशिक्षित टीम हो और जरूरत पड़ने पर अंगों को समय पर मरीज तक पहुंचाने की व्यवस्था हो।




