बिलासपुर। आरक्षण विधेयक रोके जाने पर हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल सचिवालय को नोटिस जारी किया है। छत्तीसगढ़ सरकार की ओर ने सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील व पूर्व केन्द्रीय मंत्री नेता कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। सोमवार को हाईकोर्ट में कपिल सिब्बल ने तर्क देते हुए किसी भी विधेयक को रोकने का सीधा अधिकार राज्यपाल को नहीं है। राज्यपाल प्रदेश में अपनी भूमिका का निर्वाहन करने के बजाय भाजपा नेता की तरह व्यवहार कर रही हैं।

बता दें छत्तीसगढ़ में आरक्षण विधेयक विधानसभा में पास हो गया है। इस विधेयक को विधानसभा पास हुए दो माह से भी ज्यादा का समय बीत चुका है। छत्तीसगढ़ सरकार का विधेयक राजभवन में हस्ताक्षर के लिए रुका है। राज्यपाल द्वारा हर बार कोई न कोई कारण बताकर विधेयक पर हस्ताक्षर करने से बच रही हैं। इसके खिलाफ छत्तीसगढ़ सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की है। छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने सोमवार को तर्क दिया। इसके बाद हाईकोर्ट ने राज्यपाल सचिवालय को नोटिस जारी कर एक सप्ताह में जवाब मांगा है।द
ऐसा है छत्तीसगढ़ सरकार का आरक्षण चक्र
राज्य सरकार ने दिसंबर 2022 के पहले सप्ताह में विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान आरक्षण विधेयक पारित किया था। सरकार ने छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति के लिए 32 फीसदी, ओबीसी के लिए 27 फीसदी, अनुसूचित जाति के लिए 13 फीसदी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 4 फीसदी आरक्षण देने का निर्णय लिया। विधेयक पारित होने के बाद इसे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए बिल को राजभवन भेजा गया। राज्यपाल अनुसूईया उइके ने अब तक इसपर अपनी स्वीकृति नहीं दी है।
सोमवार को आरक्षण विधेयक पर लगी याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई हुई। इस दौरान छत्तीसगढ़ शासन की ओर से कपिल सिब्बल ने कहा कि विधेयक पारित होने के बाद राज्यपार को स्वीकृत या अस्वीकृत करने का अधिकार है। जबकि छत्तीसगढ़ की राज्यपाल यह दोनों ही नहीं कर रही है। अब तक न तो उन्होंने विधेयक पर सहमति जताई और न ही असहमति। राज्यपाल छत्तीसगढ़ में अपनी भूमिका का निर्वाहन न कर केन्द्र व भाजपा के इशारों पर काम कर रही हैं। यदि राज्यपाल को बिल पर असहमति है तो वे राज्य सरकार को वापस लौटा दें। जबकि वे ऐसा नहीं कर रही है। बहरहाल कोर्ट ने सरकार की ओर से पेश किए गए तर्कों के बाद राज्यपाल सचिवालय को नोटिस इशू किया है।




