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विरासत संरक्षण अभियान कोरिया में तेज, 93 पांडुलिपियां चिन्हित

By Mohan Rao
Published: April 23, 2026
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कलेक्टर की अपील-‘ज्ञान भारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण‘ अभियान‘ में भागीदार बनें’

कोरिया। जिले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने के लिए ‘ज्ञान भारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण‘ अभियान तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में विगत बुधवार को आयोजित वीडियो कांफ्रेसिंग में उन्होंने इस सम्बंध महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए।

कलेक्टर चन्दन त्रिपाठी ने जिले के नागरिकों से इस पहल में सक्रिय भागीदारी की अपील करते हुए कहा है कि 70 वर्ष या उससे अधिक पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियों की जानकारी प्रशासन को अवश्य दें। कलेक्टर ने बताया कि सर्वेक्षण कार्य के लिए प्रशासनिक स्तर पर व्यापक तैयारी की गई है और इसे व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है।

जिले में पांडुलिपि संरक्षण के लिए डिप्टी कलेक्टर उमेश कुमार पटेल को नोडल अधिकारी एवं प्रभारी अधिकारी (पुरातत्व एवं पर्यटन शाखा) नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही सर्वेक्षण कार्य के लिए एक समिति का गठन किया जा चुका है और 68 सर्वेयरों की तैनाती की गई है, जो विभिन्न क्षेत्रों में पांडुलिपियों की पहचान और जानकारी संकलित कर रहे हैं। अब तक जिले में कुल 93 पांडुलिपियों की पहचान की जा चुकी है, जिनमें से 63 पांडुलिपियों की जानकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड की जा चुकी है।

इनमें से 16 पांडुलिपियां हाल ही में अपलोड की गई हैं। विशेष बात यह है कि ये सभी पांडुलिपियां वर्ष 1948 के पूर्व की हैं, जो उस समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की झलक प्रस्तुत करती हैं। इन पांडुलिपियों में ऐतिहासिक दस्तावेज, उस दौर की प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जुड़े अभिलेख, निमंत्रण पत्र, उत्सव आयोजन से संबंधित दस्तावेज और प्राचीन सनातनी मंत्र शामिल हैं, जो जिले की समृद्ध परंपरा और ज्ञान विरासत को दर्शाते हैं।

कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि सर्वेक्षण प्रक्रिया पूरी तरह स्वैच्छिक है और इसमें भाग लेने से पांडुलिपियों के स्वामित्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने मठ, मंदिर, पुजारी, बैगा, चिकित्सक, साहित्यकार, पत्रकार, जन प्रतिनिधियों सहित आम नागरिकों से अपील करते हुए कहा है कि इस अभियान में सहयोग करते हुए हस्तलिखित पांडुलिपि के बारे में अवश्य जानकारी  दें। उन्होंने कहा पांडुलिपि की सिर्फ बुनियादी जानकारी साझा करनी होगी, जबकि मूल दस्तावेज सुरक्षित उनके पास ही रहेंगे और मौके पर ही उनकी डिजिटल स्कैनिंग या प्रतिलिपि तैयार की जाएगी। जिला प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि यह पूरा अभियान पारदर्शिता के साथ संचालित किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य विरासत को संरक्षित किया जा सके और शोधकर्ताओं को भी इसका लाभ मिल सके।

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