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ओडिशा और छत्तीसगढ़ के दूर-दराज़ के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को किया जा रहा मजबूत

By Om Prakash Verma Published April 9, 2026
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ओडिशा और छत्तीसगढ़ के दूर-दराज़ के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को किया जा रहा मजबूत
ओडिशा और छत्तीसगढ़ के दूर-दराज़ के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को किया जा रहा मजबूत
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रायपुर/ ओडिशा और छत्तीसगढ़ ऐसे राज्य हैं जिन्हें विरोधाभासी कहा जाता है क्योंकि एक तरफ तो ये खनिजों से समृद्ध हैं, देश की मिनरल इकॉनमी इन पर बहुत निर्भर है; यहां से उद्योगों को कोयला, बॉक्साइट, एल्युमीनियम और लौह अयस्क की आपूर्ति होती है, जिससे उद्योगों की वृद्धि होती है। फिर भी, उनके कई ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े अभी भी देश के औसत स्तर से पीछे हैं। इन इलाकों तक पहुंचने की कठिनाई, पोषण की कमी और उत्तम स्वास्थ्य व चिकित्सा सेवाओं की कमी लोगों के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

खनन और इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व) और स्वास्थ्य हस्तक्षेप इन भौगोलिक चुनौतियों से निपटते हैं, ताकि दूरस्थ इलाकों तक कनेक्टिविटी को सुनिश्चित किया जा सके और स्वास्थ्य सेवाओं में आने वाली रुकावटों को दूर किया जा सके। ओडिशा और छत्तीसगढ़ के पिछड़े इलाकों में प्रचालन करने वाली वेदांता एल्युमीनियम ने हाल के वर्षों में दूर-दराज इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर ध्यान केन्द्रित किया है, और इस तरह ग्राम-स्तर पर जांच से लेकर तृतीयक उपचार और देखभाल हेतु मार्ग तैयार किए हैं।

सरकारी सर्वेक्षण बताते हैं कि यह तरीका क्यों ज़रूरी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस -5) से पता चलता है कि पोषण, मातृ स्वास्थ्य व बीमारी का जल्दी पता लगाने में चुनौतियां बनी हुई हैं, खासकर उन ज़िलों में जहां सुविधाएं कम हैं। ऐसे में, उद्योग से मदद पाने वाले स्वास्थ्य हस्तक्षेप भी अत्यंत आवश्यक हो जाते हैं।

वर्षों के दौरान, वेदांता एल्युमीनियम का समग्र स्वास्थ्य मॉडल अपने संचालन क्षेत्रों में स्पष्ट और सकारात्मक प्रभाव दिखा रहा है। लगातार सामुदायिक जुड़ाव और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के साथ, कंपनी ने ओडिशा और छत्तीसगढ़ में 7 लाख से अधिक लोगों को लाभ पहुंचाया है। स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से 4,09,079 लोगों तक पहुंच बनाई गई है, और इसके तीन अस्पतालों में कुल मिलाकर 1.74 लाख लोगों ने इलाज के लिए विजिट किया है।

जब फासला ही पहला अवरोध हो
ग्रामीण ज़िलों में, देखभाल का रास्ता अक्सर पहले सम्पर्क से शुरू होता है। सबसे नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा कई किलोमीटर दूर हो सकती है, जहां आने-जाने के कम विकल्प होते हैं और पहुंच भी कभी-कभार ही होती है। ऐसी जगहों पर, देखभाल में देरी अक्सर इरादे के बजाय भौगोलिक स्थिति की वजह से होती है। इसलिए, वेदांता एल्युमीनियम के स्वास्थ्य हस्तक्षेप इन कठिन पहुंच वाले समुदायों में प्रथम-स्तर डिटेक्शन, रेफरल और फॉलो-अप केयर को मज़बूत करने के लिए फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मियों, आशा कार्यकर्ताओं और एएनएम कैडर के साथ मिलकर काम करते हैं।

पहुंच के इसी अंतर को मिटाने की दिशा में मोबाइल हेल्थकेयर मॉडल एक महत्वपूर्ण प्रथम परत के तौर पर उभरे हैं। ओडिशा के झारसुगुड़ा, कालाहांडी और सुंदरगढ़ और छत्तीसगढ़ के कोरबा जैसे जिलों में इंडस्ट्रियल और माइनिंग कॉरिडोर में, वेदांता एल्युमीनियम ने सीधे गांवों में बुनियादी चिकित्सा सेवाएं पहुंचाने के लिए मोबाइल हेल्थ यूनिट (एमएचयू) तैनात किए हैं।

ट्रैवलिंग क्लीनिक के तौर पर काम करते हुए, ये एमएचयू निवारक स्वास्थ्य जागरुकता के साथ-साथ प्राथमिक प्रथम परामर्श, ज़रूरी दवाएं और बेसिक डायग्नोस्टिक्स भी देते हैं।

कई लाभार्थियों में कोरबा की श्रीमती आशा पटेल भी शामिल हैं, जो सालों से आर्थराइटिस और डायबिटीज़ से जूझ रही थीं। उनके लिए दैनिक काम भी दर्दनाक हो गए थे, और अक्सर छोटे-मोटे कामों के लिए भी उन्हें यह बात खटकती थी कि वे अपने परिवार पर निर्भर हो गई हैं। जब वेदांता बाल्को की मोबाइल हेल्थ यूनिट उनके गांव आने लगी, तो डॉक्टरों ने उनकी बीमारियों का इलाज किया, उन्हें दवाइयों, व्यायाम और दैनिक देखभाल के बारे में सलाह दी। समय के साथ, उन्हें दर्द में काफी कमी महसूस हुई, वे चलने-फिरने में सक्षम हो गईं, और अपनी सेहत को संभालने का नया विश्वास मिला।

एमएचयू ओडिशा और छत्तीसगढ़ के 200 से ज्यादा गांवों में घर-घर जाकर स्वास्थ्य सेवाएं देते हैं।

काशीपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के प्रमुख डॉ. नेत्रानंद नायक ने कहा, ’’मैं वेदांता की प्रशंसा करता हूं कि वह अपनी मोबाइल हेल्थ यूनिट्स के ज़रिए घर पर अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं। यह अहम पहल चिकित्सा तक पहुंच को बढ़ाती है और स्वास्थ्य जागरुकता बढ़ाती है, जिससे एक स्वस्थ समुदाय बनता है।’’

लेकिन जब तक मरीज़ों को रेफर करने के लिए जगहें न हों तब तक सिर्फ आउटरीच काफी नहीं है। इसे समझते हुए, वेदांता एल्युमीनियम के स्वास्थ्य सेवा प्रयास मोबिलिटी से आगे बढ़कर स्थानीय स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने तक बढ़ गए हैं, जिसका मकसद डिटेक्शन (रोग का पता लगाने) और इलाज के बीच की दूरी को कम करना है।

कालाहांडी में, एमएसजेके हॉस्पिटल आस-पास के गांवों के लिए एक सेकेंडरी केयर फैसिलिटी के तौर पर काम करता है। यह इनपेशेंट केयर, आपातकालीन सेवा और विशेषज्ञ परामर्श देता है, वरना यह न होता तो लोगों को काफी दूर स्थित अस्पताल जाना पड़ता। अपने परिवार के अनुभव के बारे में बताते हुए, कालाहांडी के बेंगाँव ग्राम पंचायत की रहने वाली रानू माझी ने बताया, ’’जब मेरी माँ बहुत बीमार पड़ीं, तो उस दिन हमारे लिए शहर के हॉस्पिटल पहुंचना संभव नहीं था। एमएसजेके हॉस्पिटल हमारी जीवनरेखा बन गया। डॉक्टरों ने तुरंत उनका इलाज किया, और यहां उन्हें जो इलाज मिला, उससे हम लम्बा व मुश्किल सफर करने से बच गए।’’

इसी तरह, झारसुगुड़ा में वेदांता डायग्नोस्टिक सेंटर डायग्नोस्टिक सेवाओं तक स्थानीय पहुंच को मजबूत करता है, और परीक्षणों को समुदायों के करीब लाकर, समय पर, इलाज में आने वाली आम रुकावटों को दूर करता है।

कैंसर उपचार की कमियों को दूर करना
गैर-संचारी रोगों (नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों) और कैंसर के लिए, खासकर, केन्द्रीय और पूर्वी भारत में डायग्नोसिस में देरी एक ढांचागत समस्या बनी हुई है। ओडिशा और छत्तीसगढ़ के जिलों के मरीज़ पहले से ही विशेष उपचार के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर मेट्रो शहरों तक जाते हैं, और अक्सर बहुत देर हो जाती है।

इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर छत्तीसगढ़ के नया रायपुर में वेदांता के बाल्को मेडिकल सेंटर (बीएमसी) को एक रीजनल टर्शियरी ऑन्कोलॉजी फैसिलिटी के तौर पर शुरु किया गया, जो केन्द्रीय भारत के कैंसर केयर ईकोसिस्टम में लम्बे समय से चली आ रही कमी को पूरा करता है।

170 बिस्तरों वाला अस्पताल बीएमसी रोकथाम और स्क्रीनिंग से लेकर डायग्नोसिस, उपचार और फॉलो-अप तक के लिए मुस्तैद रहता है। यह अस्पताल न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि ओडिशा के पड़ोसी जिलों के मरीजों को भी सेवाएं प्रदान करता है, जिससे मेट्रो शहरों तक लम्बी यात्रा की ज़रूरत कम हो जाती है।

अपनी शुरुआत के बाद से, बीएमसी ने 66,000 से ज्यादा मरीज़ों का इलाज किया है, और छत्तीसगढ़ में 500 से ज्यादा आउटरीच स्क्रीनिंग कैम्प लगाए हैं। अनुमान है कि इसके 60 प्रतिशत मरीज़ ग्रामीण और आदिवासी ज़िलों से आते हैं, जो उन समुदायों के लिए एक ज़रूरी जीवनरेखा के तौर पर इसकी भूमिका को दिखाता है, जिनके पास विशेषज्ञ कैंसर उपचार तक कम पहुंच है।

बीएमसी में इलाज करा रहे एक कैंसर सर्वाइवर ने कहा, ’’जब मैं पहली बार यहां आया था, तो मैंने उम्मीद छोड़ दी थी क्योंकि इलाज के लिए किसी बड़े शहर में जाना मेरे बस की बात नहीं थी। बीएमसी ने मेरी बीमारी का इलाज किया और ठीक होने के हर अवस्था में मेरा साथ दिया। हमारे जैसे परिवारों के लिए, यह हॉस्पिटल किसी वरदान से कम नहीं है।’’

मरीज़ों के लिए, अस्पताल करीब होना अत्यंत सहायक पहलू होता है। एक ही जगह पर डायग्नोस्टिक्स, ऑन्कोलॉजी सर्विस और फॉलो-अप की उपलब्धता इलाज के फैसलों को बदल देती है, जिन्हें वरना टाला या छोड़ दिया जा सकता था।

निरंतरता व सीमाओं को जोड़ना
कुल मिलाकर देखें तो, वेदांता एल्युमीनियम के स्वास्थ्य हस्तक्षेप तीन परस्पर जुड़ी परतों में फैले हुए हैं, जिनकी शुरुआत गांव के स्तर पर रोकथाम और जागरुकता, मोबाइल आउटरीच के जरिए जल्दी पता लगाने और रेफरल, और हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए विशेषीकृत उपचार तक पहुंच से होती है।

यह परतदार मॉडल यात्रा के बोझ को कम करता है, डिटेक्शन और इलाज के चक्र को छोटा करता है, और भारत के कुछ सबसे दूर-दराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं के रास्तों को मज़बूत करता है।

ओडिशा और छत्तीसगढ़ भारत की औद्योगिक विकास यात्रा को आगे बढ़ाते रहेंगे, लेकिन यह विकास लंबे समय तक लोगों के जीवन में वास्तविक सुधार लाएगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम खासकर स्वास्थ्य से जुड़ी कमजोरियों को कैसे दूर करते हैं। इसके लिए केवल कभी-कभार की पहल नहीं, बल्कि एक मजबूत और स्थायी व्यवस्था बनाकर व्यापक बदलाव लाना जरूरी है।

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