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छत्तीसगढ़ में ज्ञान भारत महाअभियान पूरा, तीन महीनों में मिलीं 11 हजार 808 दुर्लभ पांडुलिपियां

By Mohan Rao
Published: June 19, 2026
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दुर्लभ पांडुलिपियां सहेजने की दिशा में महासमुंद जिला अव्वल

रायपुर। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ज्ञान भारतम् मिशन के तहत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत को सहेजने की दिशा में एक बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी हासिल हुई है। राज्य में चले तीन महीने के सघन सर्वेक्षण में कुल 11 हजार 808 दुर्लभ पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण किया गया है। 15 मार्च से 15 जून 2026 तक चले इस अभियान के जरिए सदियों पुराना प्राचीन ज्ञान अब डिजिटल स्वरूप में सुरक्षित हो सकेगा।

दुर्लभ पांडुलिपियों को सहेजने की दिशा में डिजिटलीकरण (Digitization) और वैज्ञानिक संरक्षण सबसे प्रभावी कदम हैं। भारत सरकार और राज्य के संस्कृति विभाग ‘ज्ञान भारतम्’ (ज्ञान भारत) जैसे अभियानों के तहत ताड़पत्रों और भोजपत्रों पर लिखे सैकड़ों वर्ष पुराने ग्रंथों को सहेजने का कार्य कर रहे हैं। इस राज्यव्यापी सर्वेक्षण को छत्तीसगढ़ में शासन के संस्कृति विभाग के समन्वय से ज्ञान भारतम् मोबाइल ऐप के जरिए पूरा किया गया। इस दौरान निजी संग्रहों, प्राचीन मंदिरों, आश्रमों और पारिवारिक धरोहरों में छिपी ताड़पत्र व कागज की अमूल्य पांडुलिपियां सामने आईं, जिनमें ताड़पत्रों की संख्या सर्वाधिक है।

महासमुंद जिला रहा सबसे आगे, बस्तर-रायपुर में भी बड़ा खजाना
सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों में साहित्य और ज्ञान की समृद्ध परंपरा बिखरी हुई थी। इसमें महासमुंद जिले से 3,498 पांडुलिपियों की संख्या सर्वाधिक के साथ राज्य में प्रथम स्थान पर रहा। रायपुर जिले में 1,770 पांडुलिपियां मिली, जिससे दूसरे स्थान पर रहा। बस्तर जिले में 1,610 पांडुलिपियों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। रायगढ़ जिले में 1,553 पांडुलिपियां पंजीबद्ध की गईं। इसके अलावा कोरबा, सारंगढ़-बिलाईगढ़, राजनांदगांव, मुंगेली और कोरिया जिलों से भी भारी मात्रा में दुर्लभ दस्तावेज मिले हैं।

भाषा और लिपियों की अनूठी विविधता
ज्ञान भारतम् मिशन के राज्य नोडल अधिकारी श्री प्रभात सिंह ने बताया कि इन पांडुलिपियों में धर्म, आध्यात्म, कर्मकांड, वैदिक चिकित्सा (आयुर्वेद), ज्योतिष, दर्शन, इतिहास तथा स्थापत्य कला से जुड़ी बहुमूल्य जानकारियां दर्ज हैं। जांच में पाया गया कि ताड़पत्रों पर मुख्य रूप से उड़िया भाषा और उड़िया लिपि का प्रयोग हुआ है, जबकि कागज पर लिखित पांडुलिपियों में देवनागरी लिपि के साथ ब्रज भाषा और अवधी भाषा देखने को मिलती है। यह विविधता छत्तीसगढ़ के प्राचीन सांस्कृतिक संपर्कों और ऐतिहासिक आदान-प्रदान को प्रमाणित करती है।

मूल मालिकों के पास ही सुरक्षित रहेंगी पांडुलिपियां
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र ने इसे भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्जागरण बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शासन द्वारा केवल इन पांडुलिपियों का पंजीयन और दस्तावेजीकरण किया गया है। ये दुर्लभ पांडुलिपियां मूल रूप से जिन व्यक्तियों या संस्थाओं की हैं, उन्हीं के पास सुरक्षित रहेंगी। इस रिकॉर्डिंग का उद्देश्य भविष्य में शोध और व्यवस्थित अध्ययन को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि कई ऐसे विषय जिनके अब तक सिर्फ किस्से सुने जाते थे, उनके मूल दस्तावेज पहली बार दुनिया के सामने आए हैं।

विलुप्त हो रही ज्ञान परंपराओं को बचाने का राष्ट्रीय प्रयास
यह अभियान महज कागजों की गिनती नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के बिखरे हुए ज्ञान को समेटने का एक बड़ा राष्ट्रीय अनुष्ठान है। जिस तरह इतिहास में नालंदा विश्वविद्यालय के नष्ट होने से ज्ञान का बड़ा भंडार खो गया था, यह मिशन वैसी ही विलुप्त हो रही ज्ञान परंपराओं को नया जीवन दे रहा है। इन 11 हजार 808 पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण आने वाली पीढ़ियों को उनके गौरवशाली अतीत से जोड़ेगा।

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