-दीपक रंजन दास
नशाखोरी की प्रवृत्ति तेजी से पैर पसार रही है। पहले जहां युवाओं और अधेड़ों की ही पहचान नशेड़ी के रूप में की जाती थी वहीं अब यह कोढ़ समाज के सभी वर्गों को अपनी चपेट में ले चुका है। बच्चे और महिलाएं भी ताल ठोंककर इस मामले में बराबरी करने लगी हैं। नशाखोरी न केवल सेहत बिगाड़ती है बल्कि यह तमाम सामाजिक बुराइयों की भी जड़ है। पहले नशा – गांजा, शराब और तम्बाकू तक सीमित था पर अब इसमें तमाम सिंथेटिक नशीले पदार्थ भी शामिल हो गए हैं। इसकी खपत युवाओं के बीच अधिक है। सिंथेटिक नशीले पदार्थ खुले बाजार में उपलब्ध नहीं होते। इनकी ट्रैफिकिंग अर्थात तस्करी होती है। इसे डिलीवरी का नेटवर्क होता है। नेटवर्क बनाने के लिए स्कूल कालेज के विद्यार्थियों, विशेषकर होस्टल या पीजी में रहने वालों को टारगेट किया जाता है। एक तरफ जहां यह नशा खतरनाक है वहीं दूसरी तरफ इसकी तस्करी में पैसा भी बहुत है। यह युवाओं को अपराध की काली दुनिया से जोड़ रहा है। नशाखोरी के खिलाफ छत्तीसगढ़ सिंधी काउंसिल और छत्तीसगढ़ चेम्बर ऑफ कॉमर्स पिछले कुछ वर्षों से विद्यार्थियों के बीच एक अभियान चला रहा है जिसका नाम है-‘जिन्दगी न मिलेगी दोबारा।’ इसका आशय स्पष्ट है कि एक बार नशे के चंगुल में फंस गए तो फिर संभलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। घर-बार तो बर्बाद होगा ही, जान भी जा सकती है। इसके साथ ही सड़क हादसों की लगातार बढ़ती संख्या को देखते हुए वह यातायात नियमों की जानकारी देने के साथ ही दुपहिया सवारों को हेलमेट लगाने के लिए भी प्रेरित कर रही है। इसके समानान्तर पुलिस भी एक अभियान चला रही है जिसका नाम है ‘हैलो जिन्दगी।Ó इसके जरिए पुलिस विद्यार्थियों को जीवन के उजले पक्षों से जोडऩे की कोशिश कर रही है। उन्हें खेल, अध्ययन और अन्य सकारात्मक-रचनात्मक कार्यक्रमों से जोडऩे का प्रयास कर रही है। उन्हें सड़क हादसों से बचाने की कोशिशों के साथ ही हेलमेट पहनने के लिए प्रेरित कर रही है। पर यह प्रहार समस्या की जड़ों पर नहीं हो रहा। इस तरह के तमाम जागरूकता अभियान समय-समय पर चलाए जाते हैं पर इसका कोई असर समाज पर पड़ता दिखाई नहीं देता। अभियान केवल चलाने के लिए चलाये जाते हैं, कुछ करने के लिए चलाए जाते हैं। तामझाम के साथ कार्यक्रम होते हैं, कुछ तस्वीरें छप जाती हैं और बीमारी पहले से भी ज्यादा उग्र होकर सामने आती है। दरअसल, भारतीय समाज एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पारिवारिक बंधन ढीले पड़ रहे हैं, संवादहीनता के चलते लोग एकाकी हो रहे हैं। एकल परिवारों की बढ़ती संख्या और माता-पिता दोनों के कामकाजी होने के कारण परिवार-परिवार नहीं रह गए। उपभोक्तावाद अपने चरम पर है। मानवीय मूल्य हाशिए पर हैं। नशाखोरी जीवन के इसी खालीपन को भरने का साधन है। जब तक जीवन का यह खालीपन दूर नहीं होगा, नशाखोरी की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना संभव नहीं होगा।





