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Gustakhi Maaf: सूली पर चढ़ी बेशकीमती योजनाएं

By Om Prakash Verma
Published: February 11, 2024
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ की पिछली सरकार ने एक से बढ़कर एक ऐसी योजनाएं प्रारंभ की जिसका पूरे देश में डंका बजा. स्वयं प्रधानमंत्री ने भी उन योजनाओं की तारीफ की. पर इन योजनाओं को सही ढंग से अमल में नहीं लाया जा सका. नरवा-गरुवा-घुरवा-बारी योजना का तो पता नहीं पर आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालयों और गोठानों पर खतरा मंडराने लगा है. इनमें से गोठान योजना की सफलता तो ग्रामीणों के सहयोग पर निर्भर थी पर आत्मानंद स्कूलों की आत्मा जिला कलेक्टरों में निहित थी. सरकार बदलते ही इन स्कूलों से बहुत सारे शिक्षक नौकरी छोड़कर अपनी पुरानी प्राइवेट नौकरी में लौट गए. उन्हें आभास हो चला था कि अब इन स्कूलों की वाट लगने वाली है. आरोप हैं कि कलेक्टरों के अधीन इन स्कूलों का संचालन ठीक से नहीं हो पा रहा था. इसलिए अब स्कूली शिक्षा विभाग ही इनका संचालन करेगा. वैसे कायदा भी यही है कि जब देशभर में शिक्षा को हमवार बनाने की कोशिशें हो रही हैं तो स्कूली शिक्षा के लिए राज्य में समानांतर व्यवस्था की वकालत नहीं की जा सकती. ऊपर से इन आत्मानंद स्कूलों के कारण निजी स्कूलों के संचालकों की आत्मा कष्ट में थी. बड़ी संख्या में उनके शिक्षक और बच्चे स्कूल छोड़कर जा रहे थे. ग्रामीण क्षेत्र के अनेक निजी स्कूलों में तो तालाबंदी की नौबत आ गई थी. अब जबकि सरकार ने इन स्कूलों को स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन करने की घोषणा कर दी है तो पालक, शिक्षक और विद्यार्थी तीनों ही दोमने की स्थिति में हैं. शिक्षा विभाग के अधीन होने का मतलब है कि अब यहां भी तबादला नीति लागू हो जाएगा. चहेतों की पोस्टिंग होने लगेगी और उत्कृष्टता गुम हो जाएगी. चुनिंदा स्कूलों को छोड़ दें तो अधिकांश आत्मानंद स्कूल अव्यवस्था के शिकार थे. फर्नीचर, शिक्षक, अधोसंरचना का अभाव तो था ही, शिक्षकों में वह जिजीविषा भी नहीं थी जो ऐसी किसी योजना को परवान चढ़ा सकती. इन स्कूलों का संचालन ढांचा भी किसी की समझ में नहीं आ रहा था और अफवाह थी कि देर सबेर ये स्कूल बंद हो जाएंगे. दूसरी महत्वाकांक्षी योजना थी गोठानों की. लावारित और आवारा पशुओं को एकत्र करने के लिए गोठानों को बनाया गया था. यहां चारा पानी की व्यवस्था की जानी थी ताकि मवेशी एक ही स्थान पर रहें. इससे न केवल खेत सुरक्षित रहते बल्कि सड़कों पर मवेशियों का उत्पात भी कम होता. इन गोठानों को आर्थिक गतिविधियों की तरह विकसित किया जा रहा था. इसमें प्रमुख थी गोबर खाद, गोमूत्र से बने कीटनाशक और गोबर से बनाए गए उत्पाद. कुछ गोठानों में काम भी हुआ, ग्रामीण महिलाओं को काम भी मिला, आमदनी भी हुई पर लोगों की चेतना नहीं जागी. गोबर-कीचड़ में भविष्य ढूंढना उन्हें नहीं जंचा. जमाना आज आर्गेनिक का दीवाना है. आर्गेनिक टैग लगते ही क्या दाल, क्या फल और क्या सब्जियां, इनकी दरें आसमान छूने लगती हैं. पर समर्थन मूल्य वाली फसलों ने इनका खेल बिगाड़ दिया.

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