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Gustakhi Maaf: शिवलिंग पर चढ़ा दी अपनी जीभ

By Om Prakash Verma
Published: July 18, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
जांजगीर चांपा जिले के डोंगाकहरौद स्थित डूमरिहा तालाब किनारे स्थित शिव मंदिर में सावन के दूसरे सोमवार को गांव के ही 19 वर्षीय चंद्रशेखर पटेल ने अपनी जीभ काटकर चढ़ा दी। इससे पहले उसका बड़ा भाई सुखीराम और उसकी मौसी भी अपनी जीभ शिवजी को अर्पित कर चुकी हैं। देवी देवताओं को अपनी जीभ काटकर चढ़ा देने की यह कोई पहली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएं देश के कोने-कोने से सामने आती रही हैं। मध्यप्रदेश के नीमच जिले के मनासा तहसील स्थित आंतरी माता मंदिर में अब तक सैकड़ों भक्त अपनी जीभ चढ़ा चुके हैं। कहा जाता है कि मनौती पूर्ण होने पर यहां जीभ चढ़ाने की परम्परा है। इस मंदिर को एक तीर्थ की मान्यता है। अप्रैल 2016 में तो एक ही दिन में छह भक्तों ने अपनी जीभ चढ़ा दी थी। 2016 में ही छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की एक 11 वर्षीय आदिवासी किशोरी चमेली सिदार ने शिवलिंग को अपनी जीभ चढ़ा दी थी। जीभ चढ़ाने की इस परम्परा की शुरूआत कहां से हुई, इसकी कोई ठीक-ठीक जानकारी नहीं मिलती। पर जानकारों का कहना है कि पहले-पहल जीभ काटने की शुरुआत सजा के तौर पर हुई। जीभ को तमाम मुसीबतों की जड़ माना जाता है। जो लोग स्वाद के दीवाने होते हैं, वो अकसर अपनी सेहत से खिलवाड़ कर बैठते हैं। लोभ के वशीभूत होकर लोग नमक, मसालों और चीनी का अत्यधिक सेवन करने लगते हैं, अखाद्य-कुखाद्य वस्तुओं का भी भक्षण कर लेते हैं। इससे शरीर रोगी हो जाता है। जीभ को तमाम झगड़ों की भी वजह माना जाता है। घरों से लेकर दो देशों के बीच झगड़ों में भी इसकी अहम भूमिका होती है। इसलिए अच्छी सेहत और अच्छे रिश्तों के लिए जीभ को नियंत्रण में रखने की सलाह दी जाती है। पर दिक्कत यह है कि जीभ चढ़ाने की यह परम्परा केवल भोले-भाले लोगों को ही प्रभावित कर पाती है। जिन्हें वास्तव में अपनी जीभ चढ़ा देनी चाहिए, उनके मन में ऐसी कोई आस्था नहीं है। उन्होंने तो अब कई-कई जीभ उगा लिये हैं। सोशल मीडिया में तो बिना जीभ चलाए भी वो वाही-तबाही बकने लगते हैं। ऐसे लोगों की जीभ का ही प्रताप है कि देश में असंतुष्ट लोगों की संख्या ही ज्यादा है। इन्हीं लोगों की जीभ की बदौलत देश में अशांति फैलती है, दंगे होते हैं। कुछ लोगों के लिए तो जीभ ही उनकी आजीविका है, जीभ ही उनका वजूद है। जीभ के फिसलने की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी इसकी सजा भुगत रहे हैं। उनकी जीभ क्या फिसली, सांसदी चली गई। पहले अपील नहीं करने की जिद पर अड़े राहुल अब सुप्रीम कोर्ट की शरण में हैं। पर अकेली जीभ को इन विकारों के लिए जिम्मेदार ठहराना गलत होगा। जीभ से ही गीत और संगीत है, भाईचारा, प्रेम और भक्ति है, आस्था है। असली दोष तो दिमाग का है पर उसे काटकर चढ़ाया नहीं जा सकता।

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