-दीपक रंजन दास
देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। अमृत निकला था समुद्र मंथन के बाद। मंथन की पीड़ा को झुठला कर स्वार्थ ने केवल अमृत को याद रखा। इसी मंथन से हलाहल भी निकला था जिसे शिवजी ने अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की थी। पर यह उलटप्रवाह का दौर है। अमृत को किसी ने गायब कर दिया है और गरल (विष) का भंडारा चल रहा है। उसपर तुर्रा यह कि यह सब सनातन के नाम पर हो रहा है। देश की एक बड़ी आबादी आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से नफरत करती है। पिछले एक-डेढ़ दशक से एक सुनियोजित अभियान के तहत भारत के इन दोनों नेताओं को बदनाम किया जा रहा है। इतिहास की नई परिभाषाएं की जा रही हैं। उन सारी उपलब्धियों को झुठलाया जा रहा है जिसकी वजह से आज भारत आत्मनिर्भर और पहले से कई गुना अधिक मजबूत है। यदि गांधी ने आम जनता को आजादी के आंदोलन से न जोड़ा होता तो स्वतंत्रता संग्राम का स्वरूप कुछ और ही होता। नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र में आधारभूत उद्योगों की नींव न रखी होती तो बिरला देश के सबसे बड़े उद्योगपति होते। इंदिरा ने पाकिस्तान के दो टुकड़े किये, बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया पर आज लोगों को केवल इमरजेंसी याद है। राजीव ने तमाम विरोधों के बीच देश में कम्प्यूटर युग की शुरुआत की जो आज जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। कम्प्यूटर और इंटरनेट की बदौलत ही देश के सभी बैंक, एटीएम, डिजिटल पेमेंट गेटवे काम कर पा रहे हैं। जिस आधार कार्ड को ‘निराधारÓ और यूपीए सरकार की राजनीतिक नौटंकी करार देकर भाजपा सत्ता में आई, आज वही आधार उसकी योजनाओं के केन्द्र में है। दरअसल, ये सभी नेता भविष्यद्रष्टा थे और दूर की सोच के साथ काम करते थे। पर आज उन तमाम उपलब्धियों को झुठलाया जा रहा है जिनकी बुनियाद पर देश प्रगति कर रहा है। प्रसिद्ध कवि डॉ कुमार बिस्वास कहते हैं कि उनके दादाजी अपने जीवन काल में केवल जमीन का एक टुकड़ा ही खरीद पाए थे। उनके पिता ने उसपर एक छोटा सा आशियाना बनाया था। आज उनके पास एक विशाल फार्महाउस है। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए तीन पीढिय़ां लग गईं। तीनों का योगदान समान रूप से महत्वपूर्ण है। यही भारतीयता है, यही सनातन संस्कृति है कि हम अपने पूर्वजों के योगदान को याद रखते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने दिल्ली के नेहरू म्यूजियम का नाम बदले जाने पर तंज कसा है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि भाजपा ने खुद बनाकर उसका नामकरण किया होता तो बात समझ में आती, लेकिन वह तो नेहरू का नाम मिटाने में लगी है। पर इस तरह नेहरू तो क्या, किसी की भी हस्ती मिटाई नहीं जा सकती। ऐसी हरकतें जलकुकड़ों को खुश कर सकती है पर इतिहास नहीं बदल सकती।





