-दीपक रंजन दास
हादसा या अपराध होने के बाद की कार्यवाही तो मात्र एक उपचार है, समझदारी तो इसमें है कि हादसे और अपराध रोकने की कोशिशें की जाएं. छत्तीसगढ़ पुलिस इन दिनों इसी में लगी हुई है. यह तो सभी जानते हैं कि 1990 के बाद से देश में सड़कों का शानदार जाल बिछने लगा है. इसके साथ ही नए दौर की गाड़ियों की रेलमपेल मची हुई है. सड़क हादसों की संख्या बढ़ रही है. तमाम सुरक्षा मानकों पर खरा उतरने के बाद भी सड़क हादसों में वाहन लोगों की जान नहीं बचा पा रहे हैं. वजह भी साफ है कि जिस रफ्तार से शानदार सड़कें बनीं, नई-नई गाड़ियां आई, उस रफ्तार से लोगों का ट्रैफिक सेन्स डेवलप नहीं हुआ. दरअसल, देश में लोगों को यातायात की शिक्षा देने की कोई व्यवस्था ही नहीं है. चंद सवालों के जवाब देकर लोग ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त कर लेते हैं. पैदल चलने वालों, साइकिल सवारों और अब बैटरी चलित टूव्हीलर्स के लिए तो यह भी जरूरी नहीं है. ये सभी सड़कों पर होते हैं और हादसों का न केवल शिकार होते हैं बल्कि हादसों का कारण भी बनते हैं. अब छत्तीसगढ़ पुलिस लोगों में ट्रैफिक सेंस पैदा करने की कोशिश कर रही है. इसका असर दुर्ग से लेकर बिलासपुर तक में देखा जा रहा है. दुर्ग एसपी डॉ अभिषेक पल्लव जहां लगातार सार्वजनिक मंचों से सड़क हादसों को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं वहीं बिलासपुर एसपी संतोष सिंह ने यातायात की पाठशाला शुरू की है. यातायात नियमों की उपेक्षा, अवहेलना करने वालों का फिलहाल चालान नहीं काटा जा रहा है. उन्हें यातायात की पाठशाला में बैठा कर यातायात नियमों की जानकारी दी जा रही है. उन्हें बताया जा रहा है कि किसी नियम को क्यों बनाया गया है, उसे तोड़ने पर क्या नुकसान हो सकता है. इसका लोगों पर सकारात्मक और रचनात्मक असर देखा जा रहा है. ट्रैफिक की बारीकी सीखकर लोग न केवल स्वयं संभल रहे हैं बल्कि अपने बच्चों और परिजनों को भी इसकी जानकारी दे रहे हैं. दो दशक पूर्व जर्मनी से आए एक अध्ययन दल से भारतीय यातायात पर चर्चा हुई थी. यह दल नागपुर में उतरने के बाद सड़क मार्ग से उड़ीसा की यात्रा कर रहा था. जब उनसे पूछा गया कि सड़क यात्रा का उनका अनुभव कैसा रहा तो उन्होंने जो जवाब दिया वह काफी रोचक था. उन्होंने कहा कि थोड़ी देर तक ट्रैफिक की ओर देखने के बाद उन्होंने घबराकर आंखें बंद कर लीं. उन्हें लगा कि कभी भी हादसा हो सकता है. लगभग 400 किलोमीटर की यात्रा के बाद भी जब उन लोगों ने स्वयं को सुरक्षित पाया तो उन्हें यकीन हो गया कि यह केवल ईश्वर की कृपा है. उन्हें गाड़ियों के आगे अंकित स्वस्तिक और डैशबोर्ड पर बैठे भगवान की ताकत का अंदाजा भी हो गया. पर पुलिस सड़कों को और भी सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रही है और इसमें सबको सहयोग करना चाहिए.
Gustakhi Maaf: ट्रैफिक की क्लास तो लगानी ही पड़ेगी




