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Gustakhi Maaf: गोबर-गोबर हो गई गोधन न्याय योजना

By Om Prakash Verma
Published: August 12, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
घटिया राजनीति के चलते अच्छी खासी योजनाओं को पलीता लगने का यह कोई पहला मामला नहीं है। तमाम योजनाएं अच्छी नीयत के साथ बनाई जाती हैं पर उनका क्रियान्वयन इस तरह किया जाता है कि सब गुडग़ोबर हो जाता है। यह एक सुस्थापित तथ्य है कि गोबर खाद बागवानी के लिए सर्वोत्तम है। रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों से उकताई हुई जनता अब आर्गेनिक उपज की तरफ आकर्षित हो रही है। इसके लिए ज्यादा पैसे भी खर्च कर रही है। बड़े-बड़े उद्योगपति खेती-किसानी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं और उसमें निवेश कर रहे हैं। यह इकलौता रुझान ही यह बताने के लिए काफी है कि खेती-किसानी अब लाभ का व्यवसाय बन चुकी है। छत्तीसगढ़ समेत देश के कई राज्य गोबर खरीदी और कम्पोस्ट की ओर अग्रसर हैं। माना जाता है कि इससे गोवंश की सुरक्षा के साथ-साथ कृषि का स्वरूप भी बदलेगा। सड़कों पर आवारा मवेशियों की संख्या में कमी आएगी, गोधन को कत्लखाने भेजने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। कृषि उपज की गुणवत्ता अच्छी होगी तो लोगों की सेहत भी बेहतर होगी और स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च में कटौती की जा सकेगी। पर बड़ी संख्या में किसान आज भी रासायनिक खाद का ही उपयोग करना चाहते हैं। उनकी नजर प्रति एकड़ ज्यादा से ज्यादा उपज और उसकी सरकारी खरीदी पर टिकी हुई है। उसे लगता है कि गोबर खाद की ओर लौटे तो फिर से उपज कम हो जाएगी। धान का बढ़ा हुआ समर्थन मूल्य भी इसका एक कारण है। वह क्वालिटी (गुणवत्ता) और क्वांटिटी (मात्रा) के बीच उलझा हुआ है। इस उलझन को दूर करने की बजाय सरकारी मशीनरी ने जोर-जबरदस्ती शुरू कर दी और योजना को पलीता लग गया। प्रति एकड़ एक क्विंटल गोबर खाद खरीदी का नियम क्या बना, इसकी आपूर्ति में बड़ा खेल हो गया। इतना कम्पोस्ट उपलब्ध ही नहीं था। इसलिए खोर-खखार के मिट्टी, रेती, कंकड़ जो मिला, उसीसे से बोरे भर दिये गये। अब इन बोरों को किसानों को जबरदस्ती बेचने की कोशिश की जा रही है। माना कि किसानों को वर्मी कम्पोस्ट देखे अब जमाना बीत चुका है पर हालात इतने भी बुरे नहीं हुए कि वह खाद और कंकड़-पत्थर में फर्क न कर सके। होना तो यही चाहिए था कि जैसे ही किसान शिकायत करते, सहकारी समितियां बोरों की जांच कर अमानक बोरों को हटा देतीं। पर उन्हें तो लक्ष्य पूरा करने की पड़ी थी। उनके पास वो किसान भी थे जो ऋण से बंधे हुए थे या फिर जिन्हें नकद ऋण की आवश्यकता थी। सहकारी समितियों ने ऐसे किसानों के साथ जोर-जबरदस्ती शुरू कर दी। किसान अड़ गए और फिर राजनीति शुरू हो गई। पूरी योजना ही सवालों के घेरे में आ गई। गोबर घोटाला सबसे बड़ा स्कैम बन गया। यहां तक कि संसद में भी उसकी गूंज सुनाई दी। अब जबकि जिन्न बोतल से बाहर आ ही गया है तब इसे छिपाने की कोशिश करना बेमानी है।

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