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Gustakhi Maaf: कांग्रेस की पाठशाला

By Om Prakash Verma
Published: June 18, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
भाजपा के प्रचार तंत्र का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस ने अब नई रणनीति बनाई है। कांग्रेस को खूब पता है कि उसके अपने कार्यकर्ताओं का भी इतिहास ज्ञान थोड़ा कमजोर है। कांग्रेस में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है जो डिजिटल प्रचार तंत्र से ही ज्ञान हासिल कर रहे हैं। ये भाजपा की ट्रोल सेना से तो प्रभावित हैं ही इनके मन में भी हिन्दू मुसलमान चल रहा है। कांग्रेस की मूल भावना की सलामती के लिए यह जरूरी है कि लोगों की इतिहास में रुचि जगाई जाए। इतिहास में रुचि जागेगी तो ये सही स्रोतों से ज्ञान हासिल करने की कोशिश करेंगे। आसानी से किसी के झांसे में नहीं आएंगे। दरअसल, पूरा देश ही झांसे की राजनीति से चलता आया है। कुछ ही राज्य हैं जहां के विद्यार्थियों में राजनीति को लेकर पर्याप्त जागरूकता है। वहां का बच्चा-बच्चा राजनीतिक मसलों पर बहस कर सकता है। वह जानता है कि राजनीति नेताओं तक सीमित नहीं है, इसका असर उनके भविष्य पर भी पड़ता है। इसलिए अब कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं को इतिहास पढ़ाने की ठानी है। इसकी शुरुआत आरएसएस और भाजपा के इतिहास से की गई है। रायपुर में आयोजित इस प्रशिक्षण शिविर में मुख्यमंत्री, पीसीसी अध्यक्ष, सांसद, विधायक एवं निकायों के अध्यक्ष सभी शामिल हुए। कांग्रेस को उम्मीद है कि प्रशिक्षण के बाद वे अपनी बातों को बेहतर ढंग से रख पाएंगे। आरएसएस के इतिहास में झांकेंगे तो इस बात के दस्तावेजी सबूत मिल जाएंगे कि दो राष्ट्र की अवधारणा कहां से आई और देश के दो टुकड़े क्यों हुए। इसी इतिहास को पढऩे के दौरान सावरकर के बारे में भी उन्हें समुचित जानकारी मिल जाएगी। जब बहस की बुनियाद, तथ्यों और सबूतों पर रखी जाएगी, जब उसमें दस्तावेजी सबूत होंगे तो लोगों का उसपर यकीन भी ज्यादा होगा। अभी तो यही होता है कि भाजपा और कांग्रेस पाले के इस तरफ और उस तरफ हैं। भाजपा ने तो घोषित तौर पर अब तक के इतिहास को झुठला दिया है। बात पाठ्यपुस्तकों में बदलाव तक पहुंच चुकी है। जब बात तथ्यों की होगी तो लोगों की समझ में यह भी आ जाएगा कि स्कूल या कालेज में इतिहास की प्रतीकात्मक पढ़ाई होती है। यह कभी भी पूरा इतिहास नहीं होता। यह संभव भी नहीं है। किसी युद्ध का उल्लेख करते समय राजा, मंत्री या हद से हद सेनापति के बारे में ही पढ़ाया जा सकता है। किसी भी शोध या खोज का श्रेय उसके टीम लीडर को ही दिया जाता है। उसकी पूरी टीम का उल्लेख करना संभव नहीं होता। पर इसके पीछे कोई दुर्भावना नहीं होती। क्षेत्रीय स्तर पर अनेक स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं जिनका उल्लेख इतिहास में नहीं हो पाया है। इतिहास के विस्तृत और गहन अध्ययन से इनकी जानकारी हासिल की जा सकती है। यह स्वरुचि का प्रश्न है। कोई रोक-टोक नहीं है। फिर इसके लिए किसी को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है?

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