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Gustakhi Maaf: ऐसी सरकार से कोई लड़े भी तो कैसे

By Om Prakash Verma Published September 20, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
केन्द्र सरकार प्रति क्विटंल धान 67 किलो चावल की अपनी जिद पर अड़ी है. छत्तीसगढ़ में होने वाली धान से इतना चावल निकलता ही नहीं. प्रति क्विंटल अरवा जहां केवल 52 से 54 किलोग्राम चावल निकलता है वहीं उसना में यह बढ़कर 60 किलोग्राम तक जाता है. छत्तीसगढ़ में अरवा की मिलिंग ही ज्यादा की जाती है. प्रति क्विंटल धान लगभग 15 किलो चावल कम पड़ता है. छत्तीसगढ़ के कुछ मिलर्स पिछले 10 साल से इसकी लड़ाई लड़ रहे हैं. छह साल पहले हाईकोर्ट के निर्देश पर सरकारी महकमे की निगरानी में धान की टेस्ट मिलिंग करवाई गई थी. तब मिलर्स के दावों की ही पुष्टि हुई थी. बावजूद इसके अब केन्द्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने आकर कह दिया कि छत्तीसगढ़ सरकार ने 8 लाख टन चावल कम भेजा है. इसके बाद राज्य शासन ने भी 30 सितम्बर तक चावल जमा कराने के निर्देश मिलर्स को दे दिए हैं. अब मिलर्स परेशान हैं. परेशानी इसलिए कि यह अतिरिक्त चावल कहीं है ही नहीं. उलटे शार्टेज के नाम पर मिलर्स की प्रोत्साहन राशि रोकी जा सकती है. वैसे भी पहले ही मिलर्स काफी घाटा खाकर बैठे हुए हैं. बेशक, भूपेश सरकार ने प्रोत्साहन राशि को 40 से बढ़ाकर 120 रुपए कर दिया है पर पिछले चार सालों में किसी न किसी बहाने मिलर्स का कोई न कोई भुगतान रोका जा रहा है. 2018-19 में हमाली का पैसा नहीं मिला, 2019-20 में चावल परिवहन का पैसा नहीं मिला. 2021-22 की प्रोत्साहन राशि की दूसरी किस्त नहीं मिली. 2022-23 में प्रोत्साहन राशि की एक भी किस्त का भुगतान अभी नहीं हुआ है. दरअसल, ऊपर ही ऊपर भले ही केन्द्र छत्तीसगढ़ की तारीफ कर रहा हो पर भितरखाने वह परेशान है. किसानों के बीच भूपेश सरकार की लोकप्रियता उसके गले का फांस बनी हुई है. कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में मिलर्स को परेशान किया तो इसका असर किसानों पर पड़ना तय है. दरअसल, धान की किसानी में कई पेंच हैं. किसानों को धान का पैसा दिया जाता है जबकि मिलर्स से चावल लिया जाता है. अब केन्द्र को कौन समझाए कि छत्तीसगढ़ पंजाब नहीं है. हो सकता है पंजाब में प्रति क्विंटल धान 67 से 70 किलोग्राम चावल निकलता हो पर छत्तीसगढ़ में 52 से 60 किलोग्राम ही निकलता है. क्वालिटी का अंतर भी हो सकता है. ऐसा अंतर अकेले छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि धान उत्पादक सभी राज्यों में हो सकता है. केन्द्र को कौन समझाए की पूरे देश को एक ही लाठी से नहीं हकाला जा सकता. धान की खेती पूरे देश में होती है. मिट्टी अलग है, जलवायु अलग है इसलिए फसल भी अलग-अलग ही होगी. स्वाद का अंतर भी है. जिस बासमती को उत्तर भारत में पसंद किया जाता है उसे छत्तीसगढ़िया मुंह में डालना तक पसंद नहीं करते. धान-चावल खरीदी में हिटलरशाही, छत्तीसगढ़ के आर्गेनिक खेती अभियान की भी दिशा मोड़ सकती है.

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Om Prakash Verma September 20, 2023
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