-दीपक रंजन दास
प्रदेश की भूपेश बघेल सरकार इस मैच का अपना आखिरी ओवर खेल रही है। चमत्कारी बल्लेबाज की तरह इस आखिरी ओवर से वो पूरे 36 रन निकालना चाह रही है। उम्मीद है कि ओवर में दो चार नो-बॉल भी खेलने को मिल जाएंगे। केन्द्र ने मिलेट्स मिशन शुरू किया। आज पूरी दुनिया मिलेट वर्ष मना रही है। छत्तीसगढ़ ने मिलेट्स को भी रोजगार से जोड़ दिया। आज मिलेट्स कैफे में इन गौण अनाजों से बने तरह-तरह के पकवानों की बहार आई हुई है। लोग इसे ट्राई भी कर रहे हैं और पसंद भी कर रहे हैं। खासकर जिन्हें अपने स्वास्थ्य से प्रेम है, वो मिलेट्स को किसी न किसी रूप में अपने आहार में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं। पर मास्टर स्ट्रोक खेला जाना अभी बाकी था। आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले भूपेश बघेल ने आखिरी ओवर में छक्के मारने शुरू कर दिये। सरकार ने कोदो और कुटकी को क्रमश: 3200 और 3350 रुपए के समर्थन मूल्य पर खरीदने की घोषणा कर दी। अभी लोग मुंह बाए इस शॉट को देख ही रहे थे कि बिजली कंपनी के लगभग 10 हजार अधिकारी-कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना को बहाल कर दिया। राज्य महुआ बोर्ड के गठन की भी घोषणा कर दी। बोर्ड – महुआ संग्रहण, मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण और उपयोग को बढ़ावा देगा। साथ ही स्वास्थ्य विभाग के हड़ताली अधिकारियों-कर्मचारियों पर एस्मा के तहत की गई कार्रवाई को शून्य घोषित कर दिया। दरअसल, विधानसभा चुनाव को चंद माह रह गए हैं। मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन हो चुका है। चुनाव तिथि की घोषणा किसी भी दिन हो सकती है। इसके साथ ही लागू हो जाएगी आचार संहिता। इसके बाद नई घोषणाएं नहीं हो पाएंगी। इसके बाद केवल आधा सच, आधी झूठ वाला घोषणा पत्र जारी होगा। सरकार किसी की भी बने, उसपर बहस पांच साल बाद होगी। इसलिए, चुनाव अधिसूचना जारी होने से पहले के शेष दिनों को इस मैच का आखिरी ओवर कहा जा सकता है। विधानसभा चुनावों में वैसे भी राज्य सरकार का पलड़ा हमेशा भारी होता है। खासकर तब, जब उसका पूरा फोकस राज्य पर होता है। छत्तीसगढ़ कई मामलों में बेहद समृद्ध है। धान, तेंदूपत्ता और खनिज को छोड़ भी दें तो वनोपज, महुआ और गौण अनाज के मामले में भी छत्तीसगढ़ बेहद समृद्ध है। इनके संग्रह मूल्य और बाजार मूल्य में इतना ज्यादा अन्तर है कि यदि बीच की कडिय़ों को खत्म कर दिया जाए तो विकास के अंतिम पायदान पर खड़ा संग्राहक रातों रात अमीर हो सकता है। इसकी कमाई से अब तक केवल मु_ी भर व्यापारी ही लाल होते रहे हैं। केन्द्र की प्राथमिकता मालदारों को और मालदार बनाने की है ताकि वो रोजगार का सृजन कर सकें। वहीं राज्य सरकार चाहती है कि संग्राहक और उत्पादक को भरपूर पैसा मिले ताकि इसी पैसे से बाजार उठे। प्राथमिकताओं के इस अंतर को समझ गए तो अच्छा होगा।
Gustakhi Maaf: आखरी ओवर में भूपेश के दनादन छक्के




