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Gustakhi Maaf: ‘अभिमन्यु’ तैयार कर रहे कोचिंग संस्थान

By Om Prakash Verma Published May 8, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
देश के शीर्ष शिक्षा संस्थानों में ‘ड्रॉप-आउट्स’ की संख्या बढ़ती जा रही है। 2016 से 2020 के बीच देश की 7 प्रमुख आईआईटी से यूजी के 440 विद्यार्थियों ने बीच में पढ़ाई छोड़ दी। इनमें से 63 प्रतिशत विद्यार्थी आरक्षित वर्ग से थे। मेडिकल कालेजों का हाल भी इससे अलग नहीं है। पिछले पांच सालों में एमबीबीएस के 160 विद्यार्थियों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी। पीजी (सर्जरी) के 114, पीजी (एमएस आर्थो) के 50, पीजी (ओबीजी) के 103, ईएनटी के 100, एमडी जनरल मेडिसिन के 56, बाल्य रोग के 54 सहित अन्य विषयों के कुल 1166 विद्यार्थियों ने बीच में अपनी पढ़ाई को विराम दे दिया। इसी अवधि में एमबीबीएस के 64 और पीजी कोर्सेस के 55 विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली। कुछ ऐसा ही हाल सीए, सीएस और सीएमए का है। 80 फीसदी से ज्यादा विद्यार्थी घुस तो जाते हैं पर निकल नहीं पाते। सवाल यह उठता है कि 4 साल की कड़ी मेहनत के बाद इन संस्थानों तक पहुंचे ये विद्यार्थी आखिर क्यों हिम्मत हार जाते हैं। इसका जवाब छिपा है इन संस्थानों की प्रवेश प्रक्रिया में। तीन घंटे की एक परीक्षा से यह तय कर लिया जाता है कि कौन देश के शीर्ष संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने योग्य है। इन तीन घंटों में विद्यार्थी तीन अलग-अलग विषयों के वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को हल करता है। जाहिर है कि इन परीक्षाओं के लिए अलग से तैयारी की जरूरत पड़ती है। मेडिकल, इंजीनियरिंग और सीए एंट्रेस के लिए बच्चों को तैयार करने का देश में बड़ा उद्योग चल रहा है। इनमें से कईयों की कमाई का तो सरकार को अंदाजा तक नहीं है। जिन बियाबान जगहों पर इन परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है वहां चाय-पानी भले ही न मिलती हो, इन संस्थानों के लोग वहां हजार-पांच सौ खूबसूरत रंगीन पुस्तिकाएं मुफ्त में बांट आते हैं। कमाई इतनी है कि अगर एक भी एडमिशन हो गया तो पूरा पैसा सूद सहित वापस मिल जाता है। दरअसल, ये संस्थान ‘अभिमन्यु’ तैयार करते हैं। अभिमन्यु के बारे में हम सभी जानते हैं कि महाभारत युद्ध में वह चक्रव्यूह को भेद कर घुस तो गया पर निकलने का रास्ता उसे मालूम नहीं था। उसे वहां घेरकर मार दिया जाता है। ऐसी ही हालत कोचिंग संस्थानों में एंट्रेंस की वैतरणी पार करने की तकनीक सीखने वालों की है। कोई आश्चर्य नहीं कि इन परीक्षाओं को पास नहीं बल्कि ‘क्रैक’ किया जाता है। यहां पास-फेल जैसी कोई अवधारणा नहीं है। बस रेस में आगे निकलना है। इन परीक्षाओं को ‘क्रैक’ करने के लिए कुछ विद्यार्थी 9वीं कक्षा से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। इसके बाद के चार साल उस पर दोहरा दबाव होता है। पाठ्यक्रम तो वही होता है पर दोनों ही परीक्षाएं इतनी जुदा हैं कि बच्चे को दोहरी तैयारी करनी होती है। क्या जिम्मेदारों का फर्ज नहीं कि इन परीक्षाओं को युक्तिसंगत और तार्किक बनाने की कोशिश की जाए?

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Om Prakash Verma May 8, 2023
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