-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ में सरकारी गाडिय़ों की नीलामी होनी है। सरकारी महकमा इन गाडिय़ों की नीलामी यह कहकर कर रहा है कि इन गाडिय़ों को सरकारी पंजीयन क्रमांक से नहीं चलाया जा सकता। हकीकत भी यही है कि 15 साल में किसी भी गाड़ी का पंजीयन स्वयमेव रद हो जाता है। इसके बाद दोबारा रोडटैक्स के साथ वाहन का पंजीयन कराना होता है। नीलामी की शर्तों में कहा गया कि क्रेता को इनका पंजीयन अपने नाम से कराना होगा। पर एक नियम इसके आड़े आ रहा है। 16 जनवरी 2023 को राजपत्र में प्रकाशित नियमों के बाद अब 15 साल पुरानी गाडिय़ां स्क्रैप मानी जाएंगी। इनकी नीलामी स्क्रैप के रूप में ही की जानी है। ऐसा नहीं है कि सरकारी विभागों को इसकी जानकारी नहीं है। सरकारी दफ्तरों में इसकी खूब चर्चा होती है। दरअसल, यह मामला जागरूकता का है ही नहीं। इसे हम नए दौर का कोढिय़ापना कह सकते हैं। हम इतने अलाल हो चुके हैं कि सब्जी-भाजी तक का हिसाब नहीं लगाना चाहते। कचहरियों में अब पूरा-पूरा आवेदन टाइप नहीं होता. वहां भी कम्प्यूटर ने लोगों को कोढिय़ा बना रखा है। फार्मेट निकालो, उसे भरो और प्रिंटआउट निकाल लो। यही हाल गैर सरकारी संगठनों का है. इनमें से 100 संगठनों के बाईलॉज उठा लें तो उनमें से 90 एक दूसरे की कापी मिलेंगे। केवल नाम बदला हुआ होगा। कम्प्यूटर का कॉपी पेस्ट फार्मूला लोगों से उनकी मौलिकता छीन रहा है। जब नीलामी का इश्तहार छापने की नौबत आई होगी तो पुराना इश्तहार निकालकर उसी में आवश्यक संशोधन कर लिया गया होगा। किसी ने नियम एवं शर्तों को देखने की जरूरत तक नहीं समझी होगी। यही कारण है कि अब सरकारी विभाग की खिल्लियां उड़ रही है। आरोप यह भी लग सकता है कि उसने नीलामी में ज्यादा रकम हासिल करने के लिए जानबूझकर ऐसे इशारे किये कि क्रेता को लगे कि इन गाडिय़ों को वह चला भी सकता है। आरटीओ में दोबारा पंजीयन की नौबत तो तभी आएगी जब वह नीलामी में वाहन खरीद चुका होगा। अब जब वाहन गले पड़ ही चुका होगा तो या तो उसे वह गांव में बेच आएगा या फिर कबाड़ी को बेचकर गम खा लेगा। वैसे केन्द्र सरकार इतनी बड़ी संख्या में गाडिय़ों को कबाड़ घोषित तो करवा रही है पर उसकी कोई ठोस स्क्रैप पॉलिसी सामने आना अभी बाकी है। इधर पुलिस ने कबाडिय़ों का जीना हराम कर रखा है। आखिर ये कबाड़ जाए तो जाए कहां। इन्हें रीसाइकल कौन करेगा। यदि रीसाइकल नहीं किया गया तो देश तो कबाड़ का ढेर बन कर रह जाएगा। रेलवे की ही संपत्ति को लें तो आज भी पटरियां के किनारे भारी मात्रा में रेल की उखाड़ी गई पटरियां, वैगन और डिब्बे पड़े-पड़े सड़ रहे हैं। सरकार की गरज नई गाडिय़ां बेचने तक सीमित है। इससे तगड़ा राजस्व जो मिलता है। नई गाडिय़ां जो आ रही हैं, वो 5 साल में खुद-ब-खुद कंडन हो जाती हैं।





