-दीपक रंजन दास
यह एक बेहद दु:खद स्थिति है कि देश के युवाओं का राजनीति की गुंडागर्दी में इस्तेमाल हो रहा है। सभी पार्टियों ने अपनी युवा इकाइयां बना रखी हैं जिनका उपयोग, हंगामा करने, उपद्रव करने, तोडफ़ोड़ करने यहां तक कि पुलिस-प्रशासन के साथ हाथापाई करने के लिए किया जाता है। दु:खद यह है कि इनमें से अधिकांश युवाओं को ऐसा लगता है कि वे आंदोलन कर रहे हैं। पर इससे बड़ा झूठ कोई नहीं है। आंदोलन परिवर्तन और सृजन के लिये होते हैं। 6 अप्रैल, 2011 को किशन बापट बापूराव उर्फ अन्ना हजारे ने जन लोकपाल कानून के लिए नई दिल्ली के जंतर-मंतर में अनशन शुरू किया। पूरा देश उनके साथ खड़ा हो गया। अरविन्द केजरीवाल के रूप में राजनीति को एक नया चेहरा मिला। 26 नवंबर, 2012 को आम आदमी पार्टी लांच हो गई। इस पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के रूप में काम करना शुरू किया। 10 साल में यह पार्टी दिल्ली से निकलकर, पंजाब, गुजरात, गोवा तक पहुंच गई। आज यह एक राष्ट्रीय पार्टी है और केजरीवाल एक राष्ट्रीय चेहरा। यह एक आंदोलन था। इधर भाजयुमो-अभाविप और युवक कांग्रेस-एनएसयूआई की बानगी देखिए। कांग्रेस से जुड़े युवा कभी माध्यमिक शिक्षा मंडल का दफ्तर घेर रहे हैं तो कभी ईडी-आईटी के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। वहीं भाजपा से जुड़े युवा सीजीपीएससी कार्यालय घेर रहे हैं, पुलिस के साथ झूमाझटकी कर रहे हैं। इन युवाओं को लगता है कि उनके आका सबकुछ संभाल लेंगे। पर इन्हें नहीं पता कि पुलिस के साथ धक्का-मुक्की, सार्वजनिक संपत्ति के साथ तोडफ़ोड़ की घटनाओं को अंजाम देने के कारण उनकी सरकारी नौकरी के रास्ते हमेशा के लिये बंद हो सकते हैं। दरअसल, युवा किसी भी देश की उम्मीद होते हैं। जिस छत्तीसगढ़ ने विधानसभा में हंगामा रोकने के लिए नियम बनाए, आज उसी की सड़कों पर गुंडागर्दी हो रही है। गज़ब यह है कि जिस देश ने दुनिया को अहिंसा का रास्ता दिखाया, आज वही देश सिर्फ और सिर्फ हिंसा की बातें करता है। वह अपने ही देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की चेष्टा करता है। कोई पटरियां उखाड़ रहा है, कोई रेल रोक रहा है, चक्काजाम तो आए दिन की बात हो गई है। इससे आम जनता ही ज्यादा परेशान होती है और वह आंदोलन से कट जाती है। आंदोलन करने वाले जाने-अनजाने में अपराधी बन जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि यहां लोकतंत्र है। सरकार को सबक सिखाने का सबसे बड़ा हथियार जनता के हाथ में है। इसलिए जनता के साथ जुड़े बिना कोई भी आंदोलन संभव नहीं हो सकता। अन्ना हजारे ने साबित कर दिया कि गांधीजी का रास्ता 21वीं सदी में भी प्रासंगिक है। क्रोध और आक्रोश स्थायी भाव नहीं हैं। देर सबेर इसे शांत होना होता है और फिर पछतावा और आत्मग्लानि हमें घेर लेती है। सम्राट अशोक ने इसी पछतावा के वशीभूत होकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली थी। क्या हम इससे कौई सबक लेंगे?





