-दीपक रंजन दास
कोई भी सांकल, फिर चाहे वह कितना भी भारी भरकम क्यों न हो, उसकी पूरी ताकत उसकी सबसे कमजोर कड़ी जितनी होती है. जब भार पड़ता है तो यह कड़ी टूट जाती है. सनातन ग्रंथ रामायण में भी इस बात को रेखांकित किया गया था पर प्रवचनकारों ने इसे भुला दिया. रावण का वर्णन एक ऐसे राजा के रूप में किया गया है जो प्रकाण्ड पंडित था, प्रचण्ड शक्तिशाली था, जिसका शासन तीनों लोकों पर था. इसी रावण का पतन उसकी सबसे कमजोर कड़ी विभीषण के कारण हुआ. रावण की सेना में कुम्भकर्ण, मेघनाद जैसे योद्धा थे जो राम की पूरी सेना पर अकेले भारी पड़ सकते थे. पर यह विभीषण ही था जिसने बताया कि कुम्भकर्ण इस समय विश्राम काल में हैं. यदि उसे जबरदस्ती उठाकर युद्ध क्षेत्र में भेजा जा सकता है तो उसका अंत हो सकता है. श्रीराम ने इस जानकारी का फायदा उठाया. इसी तरह मेघनाद की तपस्या का भेद भी विभीषण ने खोल दिया और उसका भी अंत हो गया. स्वयं रावण की नाभि में अमृतकलश होने का भेद भी विभीषण ने ही खोला और रावण का अंत हो गया. इसके विपरीत श्रीराम की सेना में वन्यजीवों की ही बहुलता था. पर उन सभी को श्रीराम ने उनकी क्षमताओं से पहचाना और उन्हें इसके लिए भरपूर सम्मान भी दिया. नल-नील ने समुद्र पार जाने के लिए पुल का निर्माण कर दिया तो जाम्बवंत ने सेना का कुशल संचालन किया. कोई भी देश केवल उतना ही मजबूत होता है जितना कि उसका एक-एक नागरिक. हमारी आस्था भले ही श्रीराम में हो पर हमारा आचरण रावण की तरह होता जा रहा है. विभीषण के साथ रावण ने जो किया आज अधिकांश लोग वही कर रहे हैं. महाभारत युद्ध को ही लें तो यहां भी श्रीकृष्ण ने सारथी बनकर महाभारत युद्ध में पांडवों को विजयश्री दिलाई. पर यही सारथी आज प्रताड़ित और अपमानित है. रेलवे को ही लें तो वंदे भारत, राजधानी एक्सप्रेस, तेजस या फिर शताब्दी एक्सप्रेस की चर्चा होती है. ये ट्रेनें कितनी भी अच्छी हों, उनकी रफ्तार कुछ भी क्यों न हो, सुरक्षा का पूरा दारोमदार पटरियों और ट्रेन के सारथी याने की लोको पायलट पर ही है. बातें बुलेट ट्रेन की हो रही हैं और लोकोपायलटों की दिक्कतों की तरफ किसी का ध्यान नहीं है. हाल ही में हुए ट्रेन हादसों के बाद रेलवे ने खुद यह नियम बनाया था कि लोको पायलटों से 9 घंटे से ज्यादा की ड्यूटी नहीं ली जानी है. विशेष परिस्थितियों में ही उनसे दो अतिरिक्त घंटों की ड्यूटी ली जा सकती है. पर दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे पर इसका कोई असर हुआ दिखाई नहीं पड़ता. यहां थके हुए लोको पायलटों को रिलीफ मांगने पर चार्जशीट किया जा रहा है. हादसा होने पर भी इन्हीं को सूली पर चढ़ाया जाता है. लफ्फाजी से लोगों को खुश तो कर सकते हैं पर देश मजबूत नहीं हो सकता.





