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Gustakhi Maaf: रिपोर्ट राइटिंग की अहमियत

By Om Prakash Verma
Published: March 11, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
शकुन्तला और दुष्यंत की कहानी याद है? दोनों ने पूरी ईमानदारी से गंधर्व विवाह किया था. पर इस विवाह का कोई गवाह नहीं था. विवाह के बारे में किसी को बताया भी नहीं गया था. सबूत के तौर पर केवल एक अंगूठी थी जिसे राजा दुष्यंत ने शकुन्तला को दिया था. अंगूठी गुम गई और शकुन्तला को भुला दिया गया. आधुनिक समाज दस्तावेजों पर विश्वास करता है. काम करो या न करो, यदि उसका दस्तावेजीकरण (डाकूमेंटेशन) है तो काम को हुआ मान लिया जाएगा. देश में कई कुएं, सड़कें, तालाब, शौचालय और अब गरीबों के आवास केवल दस्तावेजों के भरोसे ही चल रहे हैं. दस्तावेजीकरण जितना अच्छा होगा, काम को उतने ही अच्छे से संपादित होना माना जाएगा. जिस तरह व्यक्ति या उद्यम की सेहत जानने के लिए बैलेंसशीट, गुणवत्ता के लिए आईएसओ ISO पर भरोसा किया जाता है ठीक उसी तरह अस्पतालों के लिए एनएबीएच NABH, पैथोलॉजी लैब के लिए एनएबीएल NABL और कालेजों के लिए नैक NAAC प्रत्यायन Accreditation को महत्वपूर्ण माना जाता है. प्रत्यायन का दारोमदार दस्तावेजीकरण पर टिका होता है. दो साल पहले रायपुर के स्वनामधन्य साइंस कालेज का नैक में खराब ग्रेड आया था. इस साल भी अनेक ऐसे सरकारी कालेजों को खराब ग्रेड मिले हैं जिनकी अच्छी प्रतिष्ठा और पूछपरख है. दरअसल, इन्होंने काम तो बहुत किया पर दस्तावेजीकरण में चूक गए. इसका कोई अलग से विभाग तो होता नहीं. किसी ने रिपोर्ट बनाई, किसी ने नहीं बनाई. जब नैक की टीम कालेज पहुंची तो उनके पास दिखाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था. अखबारों की चंद कतरनें, कुछ आधे-अधूरे रजिस्टर. न तिथि की पुष्टि हो पाती थी और न ही कार्यक्रम में उपस्थिति का कोई अंदाजा लग पाता था. लिहाजा नैक टीम ने उनके कामकाज के लचर तरीके पर नाराजगी जाहिर की और रजिस्टरों पर अविश्वास जताया. इसका असर नैक की ग्रेडिंग पर पड़ा. वैसे भी उच्च शिक्षा विभाग ने सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से कह रखा है कि सभी कार्यक्रमों की जियोटैग फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराई जाए. सोशल मीडिया ऐप या ग्रुप मीटिंग ऐप पर हुए कार्यक्रम भी मान्य किये जाएंगे. इसका एकमात्र कारण यह है कि इसमें तिथि और समय के साथ स्थान भी स्वयमेव दर्ज हो जाता है. इसमें बैकडेट पर कोई काम नहीं किया जा सकता. फर्जी रिपोर्ट भी नहीं बनाई जा सकती. कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग को भी जरूरी कर दिया गया. दिक्कत यह है कि अधिकांश कालेजों में ऐसे लोगों का अकाल है जो रिपोर्ट राइटिंग कर सकें. किसी की भाषा खराब है तो किसी की राइटिंग. तकनीकी दिक्कतें भी हैं. सबसे बड़ी दिक्कत हिन्दी टाइपिंग की है, अंग्रेजी में हाथ तो पहले ही तंग है. स्क्रीनशॉट से अनजान लोग मोबाइल से कम्प्यूटर स्क्रीन की फोटो खींचते हैं. दुखद यह है कि इसके बावजूद उच्च शिक्षा विभाग रिपोर्ट राइटिंग को कोई स्किल नहीं मानता. वह मिट्टी के दिये, गोबर की मूर्तियां, रंगोली बनाओ, सलाद सजाओ में उलझा हुआ है.

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