-दीपक रंजन दास
चुनावी मौसम में पत्रकारों का जमीर भी जाग गया है. अब उन्हें समझ में आ गया है कि अगर शेर ने दहाडऩा और पंजे मारना छोड़ दिया तो उसकी कोई इज्जत नहीं रह जाएगी। बच्चे भी उसकी पूंछ में पटाखा बांधकर तमाशा देखेंगे। पत्रकार तभी तक चौथा स्तंभ है, जब तक कि वह विपक्ष में है। एक मशहूर कवि ने कहा भी है कि लोकतंत्र में जब विपक्ष कमजोर हो जाए तो पत्रकारों, लेखकों और कवियों को विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। अन्यथा ये सभी लोग अप्रासंगिक हो जाते हैं और सत्ता निरंकुश हो जाती है। इसलिए हाल ही में हुए एक मीडिया वार्ता में जब पत्रकारों ने असहज करने वाले सवाल दागने शुरू किये तो भाजपा के पास कोई जवाब नहीं था। कोई भी सरकार अपनी प्राथमिकताएं तय करने के लिए स्वतंत्र है। इसके अच्छे बुरे परिणामों की जिम्मेदारी भी उसी की होती है। सोशल मीडिया पर वायरल किये गये कूटरचित वीडियो से ऐसा लग सकता है कि पूरा देश केन्द्र के साथ है। पर लोकतंत्र की खूबसूरती ही यह है कि पांच साल में एक बार जनता की बारी आती है, जो सवाल नहीं पूछती, सीधे फैसले सुनाती है। उसकी तरफ से सवाल मीडिया पूछती है जो ‘गोदी मीडिया’ के तमगे से पहले ही खार खाए बैठी है। इसलिए वह पूछती है कि बढ़ती महंगाई को काबू में करने के लिए सरकार ने क्या किया। क्यों पेट्रोल और गैस के दाम काबू में नहीं हैं। बिहार की भाजपा विधायक कविता देवी कहती हैं – आबादी भी तो बढ़ रही है। पत्रकार पूछते हैं कि 2014 से 2023 के बीच क्या आबादी दो-तीन गुणा बढ़ गई है तो उनका मुंह बंद हो जाता है। फिर कमान संभालते हैं तेजतर्रार भजापा जिला अध्यक्ष बिचपुरिया। वो कोरोनाकाल में लगाए गए मुफ्त टीकों का हवाला देते हैं, देश में बिछाए जा रहे सड़कों के जाल का हवाला देने लगते हैं। यह क्या बात हुई? मकान बनवाने या नया फ्लैट खरीदने के लिए कौन अपने घर के राशन में कटौती करता है? वैसे भी इन सड़कों से देश सुन्दर दिख सकता है पर इन सड़कों पर गाडिय़ां दौड़ाएगा कौन? स्वयं उन्हीं के शब्दों में देश की 80 करोड़ आबादी को सरकार मुफ्त में राशन दे रही है। क्या इन सड़कों पर उनकी भी बैलगाडिय़ां या साइकिलें चलाई जा सकेंगी? वैसे भी आवागमन को लेकर केन्द्र सरकार कितनी संवेदनशील है – इसका परिचय रेलवे ने दे ही दिया है। नई ट्रेनों के नाम पर लगातार बढ़ता किराया एक खास आयुवर्ग के लोगों को रिझा सकता है पर देश की बड़ी आबादी इससे कभी संतुष्ट नहीं हो सकती। दरअसल, केन्द्र के पास कोई जवाब है ही नहीं। अगर उसे अपने कामों पर भरोसा होता तो उसे चुनावी साल में ईडी और आईटी की आड़ नहीं लेनी पड़ती। बाबाओं को हिन्दुत्व का एजेंडा नहीं सौंपा जाता। धर्मांतरण के मुद्दे को हवा न दी जाती।
Gustakhi Maaf: महंगाई पर सवाल किया तो लगे बगले झांकने




