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Gustakhi Maaf: भारतीय गण-तंत्र और भस्मासुर

By Om Prakash Verma
Published: January 27, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
15 अगस्त सन् 1947 को आजादी मिली और 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हो गया. इसके साथ ही देश ने गणतंत्र को स्वीकार कर लिया. अर्थात राजसत्ता अब देश के नागरिकों में निहित हो गई. नागरिक को भी परिभाषित कर दिया गया. नागरिकों द्वारा नागरिकों के लिए चुनी गई सरकार को शासन की जिम्मेदारी सौंपी गई. इसी संविधान ने राजनैतिक दलों के गठन का मार्ग प्रशस्त किया और लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू हुई. क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों का प्रादुर्भाव हुआ. सत्ता के साथ ही प्रतिपक्ष की भी भूमिका स्पष्ट हो गई. आज भारत दुनिया का सबसे बड़ लोकतंत्र है. देखते-देखते 73 साल गुजर गए. इन 73 सालों में एक बड़ा परिवर्तन यह आया कि एक ऐसा वर्ग मुखर हो गया जो शासन करने को अपना अधिकार मानता आया है. वह केन्द्र में विपक्ष विहीन सत्ता चाहता है. ब्रिटिश हुकूमत पर आरोप रहा है कि उसने “फूट डालो-राज करो” की नीति को अपनाया. आज स्वदेशी राजनैतिक दल भी यही कर रहे हैं. दरअसल, हम इतिहास पढ़ते जरूर हैं पर उससे सबक नहीं लेते. वरना हमें यह साफ-साफ दिखाई देता कि रामायण, महाभारत और पिछले हजार सालों का हमारा इतिहास हमें क्या संदेश दे रहा है. राजा दशरथ के घर में फूट पड़ी तो अयोध्या में अंधकार छा गया. रावण के घर में फूट पड़ी तो सोने की लंका भस्म हो गई. कौरव-पांडवों में फूट पड़ी तो महाभारत हो गया. युग बदल गए, नदियों ने अपना रास्ता मोड़ लिया पर फूट की यह बीमारी पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे साथ चलती रही. जिन चक्रवर्ती सम्राटों ने दुनिया में अपनी शौर्य पताका को फहराया, उनके वंशज लुटेरों के हाथों सत्ता गंवा बैठे. मुश्किल यही है कि हम तब भी वही करते थे जो आज कर रहे हैं. मुट्ठी भर लोग तय कर रहे हैं कि समाज किस दिशा में जाएगा. किसकी पहचान क्या होगी, उसके अधिकार क्या होंगे. रावण को राक्षस राजा और उसके सहोदर विभीषण को ऋषि पुत्र कहने में इन मठाधीशों को कभी संकोच नहीं हुआ. यह और बात है कि स्वयं प्रभु श्रीराम ने रावण वध के बाद स्वयं को ब्रह्म हत्या का दोषी माना. श्रीराम ने केवट को गले लगाया, शबरी के जूठे बेर खाए, वानर हनुमान को अपना भाई माना. शत्रु रावण को प्रणाम किया. उनका यह आचरण क्या संदेश देता है? संविधान ने इसी परिपाटी को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया. संविधान ने उन लोगों को भी समानता का अधिकार दे दिया, जिन्हें सदियों से यही समझाया गया था कि वे उच्च जातियों की सेवा के लिए पैदा हुए हैं. उन्हें सम्पत्ति का या स्वाभिमान के साथ जीने का अधिकार नहीं है. आज संविधान के खिलाफ आवाज उठ रही है. प्रवचन पंडालों से कहा जा रहा है कि संविधान को बदल देंगे, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होगी. वहीं संविधान को बचाने वाले भी लामबंद हो रहे हैं. इस फूट से देश को बचना होगा.

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