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Gustakhi Maaf: बस्तर में फूट की बिसात; दो फाड़ हुआ समाज

By Om Prakash Verma
Published: January 5, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
एक समय था जब आदिवासी कथित सभ्य समाज का प्रत्येक स्तर पर विरोध करते थे. कुछ आदिवासी समूह ऐसे भी थे जो पूरे कपड़े पहने हुए लोगों पर तीर-धनुष से आक्रमण कर देते थे. इसके चलते अबूझमाड़ का क्षेत्र काफी समय तक संरक्षित ही रहा. पर यह सब बीते कल की बातें है. आज आदिवासी समाज भी तरक्की करना चाहता है. वह चाहता है कि उनके बच्चे भी शिक्षित होकर, सभ्य समाज के बीच पहुंचे और अच्छी नौकरियां करे. बीमार पड़ने पर उनका इलाज भी अस्पतालों में पढ़े लिखे डाक्टर करें, बैगा गुनिया नहीं. उनका भी जीवन स्तर उठे. छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज शिक्षा और नौकरी में आरक्षण को लेकर काफी समय से संघर्ष कर रहा है. पर इसी आदिवासी समाज का एक धड़ा अब विकास और परिवर्तन के खिलाफ खड़ा दिखाई दे रहा है. उन्हें परिवर्तन नहीं चाहिए. वे अपनी परम्पराओं के साथ अपने गांव में जीना चाहते हैं. उन्हें तकलीफ है कि अब देव उठाने के लिए लोगों की भीड़ अपने आप नहीं जुटती बल्कि लोगों को बुलाना पड़ता है. इन लोगों का मानना है कि गांव गांव तक फैल चुके चर्चों के कारण इनकी संस्कृति खतरे में है. इन लोगों का मानना है कि ईसाई लोगों की कब्रों के कारण उनके देवताओं की शक्तियां प्रभावित रही हैं. इसलिए अब वे ईसाइयों की कब्रों को उखाड़ रहे हैं, बच्चों को ईसाई बच्चों के साथ खेलने के लिए मना कर दिया गया है. गांव-गांव में पैठ बना चुके चर्चों को तोड़ा जा रहा है. ईसाई मत को मानने वाले गांव से भागकर शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं. इससे पहले आदिवासियों के एक तबके ने स्वयं को हिन्दू मानने से इंकार कर दिया था. उनके लिए आदिवासी होना ही उनकी एकमात्र पहचान थी. ईसाइयों की खिलाफत इसकी अगली कड़ी हो सकती है. पर क्या यह वाकई संस्कृति को बचाने की लड़ाई है? लगता तो नहीं है. आदिवासी समाज आरक्षण मांग इसीलिए रहा है कि वह जंगलों से निकलकर देश की मुख्यधारा में शामिल हो सके. उसके बच्चे भी उच्च शिक्षित होकर उच्च पदों पर आसीन हो सकें. जाहिर है, ऐसा करने पर गांवों में युवाओं की संख्या कम हो जाएगी. शिक्षित समाज बैगा गुनिया के पास कम जाएगा. पर्व त्यौहारों को वह उतना वक्त नहीं दे पाएगा जितना कि उसके पूर्वज दे पाते थे. समाज शिक्षित होगा तो वह शोषण मुक्त भी होगा. उनका रहन सहन बदलेगा, जीवन की गुणवत्ता बढ़ेगी और जीवन स्तर भी ऊपर उठेगा. बैगा, गुनिया, चर्च, फादर सब अप्रासंगिक हो जाएंगे. पर मौजूदा आंदोलन इस सबके खिलाफ दिखाई देता है. यह ‘फूट डालो राज करो’ की पुरानी शराब है जिसे नई बोतल में भरकर पेश किया जा रहा है. जाहिर है इसका उद्देश्य राजनीतिक है. छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज एक बड़ी राजनीतिक शक्ति है. पर डर है कि कहीं नफरत की यह आंधी दावानल बनकर सबकुछ भस्म न कर दे.

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