-दीपक रंजन दास
कल विश्व फार्मासिस्ट्स डे था. सभी फार्मेसी कालेजों, अस्पतालों तथा औषधि उद्योग से जुड़े लोगों ने इस दिवस को मनाया. यहां विशेष जोर फार्मेसी कालेजों पर है. यहां विद्यार्थियों को मोटिवेट करने के लिए एक बार फिर फार्मा क्लीनिक या फार्मेसी क्लीनिक की चर्चा छेड़ी गई. 2015 में एक प्रमुख समाचार पत्र ने यह खबर दी कि फार्मासिस्ट भी अब ग्रामीण क्षेत्र में अपना क्लीनिक खोल सकेंगे. खबर का शीर्षक था – फार्मासिस्ट भी शुरू कर सकेंगे अब अपना खुद का क्लीनिक. ब्यौरे के मुताबिक इनका नाम फार्मा क्लिनिक होगा. केंद्र सरकार ने इस बारे में फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है. देखना है कि सरकार का यह कदम आम जनता को झोलाछाप डॉक्टरों से निजात दिलाने में कितना कारगर सिद्ध होगा. नए कानून के तहत फार्मासिस्ट को अपने क्लिनिक के बाहर बोर्ड लगाकर उस पर अपना नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर और शैक्षणिक योग्यता दर्शानी होगी. डिग्री धारी फार्मासिस्ट किसी एमबीबीएस चिकित्सक के यहां तीन माह की इंटर्नशिप करने के बाद क्लीनिक खोल सकेगा. प्राइमरी मेडिसिन के साथ ही वह आईवी फ्लूइड चढ़ा, सबक्यूटेनस, इंट्रामस्कुलर और इंट्रावेनस इंजेक्शन लगा सकेगा. वह चिकित्सक की तरह परामर्श शुल्क भी ले सकेगा. इसका फायदा यह होगा कि जनता नीम हकीमों से परामर्श और दवा लेने से बच जाएंगी. इस खबर के लगभग पांच साल बाद फैक्टचेक टीम ने इसे फेक न्यूज बताया. पर तब तक इस खबर का जो असर होना था वह हो चुका था. फार्मेसी कालेजों में विद्यार्थियों की बाढ़ आ गई थी. यह खबर आज भी उस प्रमुख दैनिक की वेबसाइट पर बनी हुई है. यह खबर क्यों और किसे फायदा पहुंचाने के लिए छापी गई, इसका सहज आकलन किया जा सकता है. उक्त खबर पर यकीन इसलिए भी कर लिया गया कि केन्द्र की नई सरकार ग्रामीण और दूरस्थ अंचलों में रहने वाले मरीजों को राहत पहुंचाने के लिए योजनाएं बना रही थी. बहरहाल, योजना की बात करें तो इसमें ज्यादा बुराई नजर नहीं आती. बी-फार्मा डिग्री धारक को दवाओं के बारे में काफी अच्छी जानकारी होती है. वैसे भी दवा दुकान वाले सामान्य बीमारियों के लक्षण पूछकर दवा अब भी देते ही हैं. यदि यह खबर हकीकत होती तो फार्मेसी संचालक इस कार्य को गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ कर रहे होते. फिलहाल वे मरीज को कोई प्रेसक्रिप्शन नहीं देते, केवल दवा दे देते हैं और पैसे लेकर रसीद काट देते हैं. इससे गड़बड़ी होने पर भी मरीज किसी कानूनी उपचार के लिए पात्र नहीं होता. पढ़े लिखों का तो यह आलम है कि वे अपने लिए दवा खुद ही तजवीज कर लेते हैं. वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो डाक्टर द्वारा लिखी गई दवाइयों के साइड इफेक्ट जानने के लिए गूगल बाबा की शरण में चले जाते हैं. ऐसे अधकचरे डाक्टरों से स्वयं डाक्टर घबराते हैं. अच्छा होता यदि दवा की पढ़ाई करने वालों पर भरोसा किया जाता.
Gustakhi Maaf: फार्मेसी पर फिर छिड़ी फार्मा क्लीनिक की चर्चा




