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Gustakhi Maaf: प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता

By Om Prakash Verma
Published: August 26, 2025
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
देश के 14वें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी संप्रति अपना तीसरा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं. इससे पहले वे चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. 2014 में उनके नेतृत्व में भाजपा ने रिकार्ड सीटें जीतकर केन्द्र में सरकार बनाई थी. तब से लेकर आज तक उनका व्यक्तिगत और पार्टी का ग्राफ लगातार बढ़ता चला गया है. हालांकि, उनकी विश्वसनीयता को चुनौती देने के लिए 2016 में सूचना के अधिकार के तहत उनकी शैक्षणिक योग्यता का प्रमाण मांगा गया. 9 मई 2016 को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर प्रधानमंत्री की डिग्रियों को सार्वजनिक भी किया. चुनाव नामांकन के दस्तावेजों के अनुसार मोदी ने 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. इसके बाद 1983 में उन्होंने गुजरात विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि ली. केंद्रीय सूचना आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय को 1978 की परीक्षा के रिकार्ड आवेदक को उपलब्ध कराने के आदेश दिये थे. दिल्ली विश्वविद्यालय इसके खिलाफ हाईकोर्ट चला गया. 2017 में हाईकोर्ट ने सूचना आयोग के निर्देश पर रोक लगा दी. 2023 में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक योग्यता व्यक्तिगत सूचना है, इसे आरटीआई के तहत उपलब्ध नहीं कराया जा सकता. हालांकि, विश्वविद्यालय ने कहा था कि इस गोपनीय जानकारी को अदालत को उपलब्ध कराने में उसे कोई आपत्ति नहीं है. 25 अगस्त को हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि डीयू डिग्री रिलीज करने के लिए बाध्य नहीं है. इस मामले में हिन्दी के मशहूर व्यंग्यकार संपत सरल की बात याद आती है. सरल ने कहा था कि जब सैटेलाइट लांच हो गया है, अपनी कक्षा में स्थापित भी हो गया है और पृथ्वी के चक्कर भी लगा रहा है तो उसके डिजाइन पर बहस करने की जरूरत नहीं है. सही है. प्रधानमंत्री अपना काम अच्छे से कर रहे हैं. वे क्या और कितना पढ़े हैं, इसपर बहस की कोई आवश्यकता ही नहीं है. डिग्री विवाद केवल उनके चुनावी हलफनामे पर सवाल खड़ा करने के लिए किया गया प्रतीत होता है. प्रधानमंत्री का पद कोई सरकारी नौकरी तो है नहीं जहां नियुक्ति के लिए एक न्यूनतम योग्यता की जरूरत होती है. जहां कागज का यही टुकड़ा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है. जहां प्रमाणपत्र गलत होने पर नौकरी तो जा ही सकती है, जेल भी जाना पड़ सकता है. वैसे भी आरटीआई कोई बाल की खाल निकालने का साधन तो है नहीं. सबकुछ घर बैठे नहीं हो सकता. सबूत जुटाने के लिए थोड़ी मेहनत तो करनी पड़ती है. मोदी के मामले में इस बात का भी ध्यान रखना होता है कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं. बहुत जरूरी होने पर ही उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है. बहरहाल, अच्छी बात यह है कि इस विवाद के निपटारे का लाभ स्मृति इरानी को भी मिल गया. सूचना आयोग ने उनकी 10वीं और 12वीं की अंकसूचियां आवेदक को उपलब्ध कराने के निर्देश दिये थे.

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