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Gustakhi Maaf: छुरी-कांटा-चम्मच से खाने का “फूहड़” चलन

By Om Prakash Verma
Published: February 24, 2024
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
फूहड़ता क्या है? हाथ से भोजन करना या ‘छुरी-कांटा-चम्मच’ की मदद से भोजन के साथ खेलना? भारतीय उपमहाद्वीप की बात करें तो छुरी-कांटे से खा पाने को यहां अप-मार्केट माना जाता है. हाथ से खाना तो केवल जाहिल खाते हैं. माना जाता है कि जिनके पास छुरी-कांटा या चम्मच नहीं होता वो गरीब टाइप के होते हैं. इसलिए अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों में बाकायदा टेबल मैनर्स की क्लास लगाई जाती है. बच्चा टेबल पर बैठता है, गोद में नैपकिन रखता है, गले में बिब बांधता है और फिर छुरी कांटे से पराठे खाने की कोशिश करता है. जब छुरी कांटे से पराठा-रोटी खाना मुश्किल हो जाता है तो वह स्वयमेव नूडल्स, फ्राइड राइस की तरफ मुड़ जाता है. इसके साथ शुरू होती है मोटापे की एक ऐसी समस्या जिससे वह आजीवन जूझता रहता है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. चार्ल्स स्पेंस कहते हैं कि हाथ से भोजन करने पर न केवल उसका टेक्सचर समझ में आता है बल्कि भोजन से मिलने वाली संतुष्टि भी बढ़ती है. भारतीय मान्यता है कि भोजन करते समय पूरे मन से केवल भोजन करना चाहिए. हाथ से भोजन करते समय यह अपने-आप हो जाता है. चम्मच से खाना खाने वाले भोजन करते हुए भी कम्प्यूटर-टैब या मोबाइल पर काम कर सकते हैं. हाथ दीगर कार्यों में व्यस्त होने के कारण ध्यान भी बंटा रहता है. भारतीय पद्धति जमीन पर बैठकर भोजन करने की भी है जिसके कारण उसके चलने फिरने या ज्यादा हिलने डुलने पर भी पाबंदी लग जाती है. तथाकथित आधुनिक समाज इसके भी खिलाफ है. लगभग पांच दशक पहले डाइनिंग टेबलों की बाढ़ आई. लोगों के घर में इसके लिए जगह बनने लगी. हालांकि मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास घरों में डाइनिंग टेबल का इस्तेमाल सामान रखने और कपड़े प्रेस करने के लिए अधिक होता रहा. पर पिछले दो-तीन दशकों में फर्श पर बैठकर भोजन करने की परम्परा का पूरी तरह लोप हो गया. लोग डाइनिंग टेबल पर तो नहीं पर गोद में भोजन की प्लेट लेकर टीवी देखते हुए भोजन करने लगे. पार्टियों में तो अब खड़े-खड़े खाने का ही चलन रह गया है – ठीक घोड़े की तरह. वैसे बड़े-बूढ़ों को दकियानूसी कहने वाला भारतीय समाज अब शायद सुधर जाए. उनकी नजर में भारत नहीं बल्कि अमेरिका विश्वगुरू है. इसी अमेरिका में अब ऐसे रेस्तरां खुलने लगे हैं जहां प्रवेश करते ही हाथ धुलाने की परम्परा है. यहां भोजन के साथ कटलरी नहीं दी जाती. भोजन हाथ से करना होता है. मैनहट्टन का एक फिलिपिनो रेस्तरां ऐसा ही करता है. इसे ‘कामायन’ परम्परा कहते हैं. सुशी रेस्तरां के शेफ भी एक खास डिश को हाथ से खाने के लिए ग्राहक को प्रेरित करते हैं. जीपनी, नक्स और पोनेस्को जैसे रेस्तरां हाथ से भोजन करने की प्रथा को पुनर्जीवित कर रहे हैं. अच्छी सेहत का जो गूढ़ रहस्य कभी भारतीय जीवनपद्धति का हिस्सा था, उसपर भी अमेरिका-रिटर्न का ठप्पा लग जाएगा.

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