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Gustakhi Maaf: छत्तीसगढ़ में गंगाजल पॉलीटिक्स

By Om Prakash Verma
Published: July 12, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव को अब दो-चार महीने ही रह गए हैं। इसके साथ ही शुरू हो गया है नाटक-नौटंकियों का दौर। पद्मश्री फिल्मस्टार अनुज शर्मा और पद्मश्री पंडवानी गायिका उषा बारले भाजपा का नया चेहरा बनने जा रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भिलाई प्रवास के दौरान पंडवानी गायिका के घर भोजन कर उनकी राजनीतिक पारी का एक तरह से शंखनाद कर दिया है। इस बीच, फिल्मस्टार ने कांग्रेस पर पहला बड़ा हमला बोला है। उन्होंने कांग्रेस पर हाथ में गंगाजल लेकर झूठी कसम खाने का आरोप लगाया है। कांग्रेस ने जवाब में कहा है कि जिन लोगों ने गंगाजल हाथ में लेकर कसम खाई थी, वो आज भाजपा में हैं। साथ ही कांग्रेस ने यह भी गिना दिया कि सत्ता में आने के 24 घंटे के भीतर भूपेश बघेल सरकार ने किन वायदों को पूरा किया। साथ ही फिल्मस्टार को किसी भी मंच पर सबूतों के साथ बहस के लिए ललकारा भी है। साल 1967 में एक फिल्म आई थी-उपकार। इस फिल्म का एक गीत है ‘कसमें-वादे-प्यार-वफा सब बातें हैं बातों का क्या…’। अब जब गीता-कुरान-बाइबल की सौगंध खाकर लोग धड़ाधड़ झूठ बोल सकते हैं तो गंगाजल हाथ में लेकर किये गये चुनावी वायदों की क्या बिसात? वैसे भी किसने देखा है कि वह ‘गंगाजल’ ही था, ‘आरओ वाटर’ नहीं। यह कोई छत्तीसगढ़ की ‘गंगाजल’ परम्परा थोड़े ही है जिसे मरते तक निभाया जाता है। छत्तीसगढ़ की एक खूबसूरत परम्परा है ‘मितान बदने’ की। यह दो पुरुषों या दो महिलाओं के बीच बनने वाला अलौकिक संबंध है। यह रिश्ता जात-पात और छुआ-छूत से ऊपर है। इस रिश्ते के कई नाम हैं। कोई गंगाजल बदता है तो कोई भोजली, कोई जंवारा बदता है तो कोई सैनांव। इन रिश्तों के आरंभ की भी अलग परिपाटी है। मितान बदने के बाद परस्पर एक दूसरे का नाम नहीं लिया जाता बल्कि उसे रिश्ते के नाम से ही पुकारा जाता है। गंगाजल बदने वाले एक दूसरे को गंगाजल के नाम से संबोधित करते हैं तो भोजली, सैनांव बदने वाले भी इन्हीं नामों का उपयोग संबोधन के लिए करते हैं। इसे जन्म-जन्मांतर का बंधन माना जाता है। इस रिश्ते में बंधे लोग सुख-दु:ख में सदैव साथ खड़े नजर आते हैं। पर रिश्तों की यह पवित्रता राजनीति में नहीं होती। मौका मिलते ही वो नेता भी पार्टी बदल लेते हैं जो पार्टी को मां कहते थे। इक्का-दुक्का को छोड़ दें तो देश में जितनी भी नवोदित पार्टियां हैं, दूसरे दलों के नेताओं से ही बनी हैं। यहां चेहरा चलता है। विश्वसनीयता से ज्यादा स्वीकार्यता चलती है। नेताओं की स्क्रिप्ट लिखने वाले पर्दे के पीछे ही रहते हैं। अभिनेता इनके लिए तैयार सामग्री होते हैं, जो स्क्रिप्ट के अनुसार भाव के साथ संवाद अदायगी कर सकते हैं। इसलिए सरकारें इनपर डोरे डालती हैं। जिन्हें चुनाव नहीं लड़वाया जा सकता, उन्हें राज्यसभा में रख लेती हैं। वैसे भी डेमोक्रैटिक पॉलीटिक्स एक ‘मेगास्क्रीन’ ही तो है।

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