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Gustakhi Maaf: चिड़चिड़ा कर दर्ज किए यूएफएम के मामले

By Om Prakash Verma
Published: June 15, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
इस साल कॉलेज और स्कूल की वार्षिक और सेमेस्टर परीक्षाओं ने यूएफएम के सारे रिकार्ड तोड़ दिये। दर्ज किए गए यूएफएम केसेस पिछले दस सालों में सर्वाधिक हैं। साइंस फिक्शन मूवी देखने वालों को यूएफएम शब्द से अनआइडेन्टिफाइड फ्लाइंग मशीन अर्थात उडऩ तश्तरियों का आभास हो सकता है पर ऐसा है नहीं। इस यूएफएम का मतलब है अन-फेयर मीन्स। अर्थात परीक्षा दिलाने के वो तरीके जो सही नहीं हैं। इसमें टीचर अथवा इन्विजिलेटर द्वारा मदद करना, आसपास बैठे दूसरे परीक्षार्थियों की कापी देखकर लिखना, स्वयं बनाकर लाए हुए चिट का इस्तेमाल करना, डिजिटल माध्यमों से नकल करना, आदि शामिल हैं। कहा जा रहा है कि कोरोनाकाल के कारण बच्चों की तैयारी अच्छी नहीं थी, ऑफलाइन परीक्षा देने की आदत छूट चुकी थी, इसलिए नकल की तरफ उनका रुझान हुआ। ऐसी बातें केवल खुद को धोखा देने के लिए कही जाती हैं। दरअसल, नकल का इतिहास भी स्वयं परीक्षा जितना ही पुराना है। नकल मारने के तरीके भी एक से बढ़कर एक होते थे। कागज के पुर्जों पर नकल लिखकर लाना तो सामान्य था। लोग अपनी जांघों पर, बाहों पर, पेन्सिल बाक्स के भीतर, यहां तक कि स्केल पर भी नकल के इशारे बना लाते थे। नकल के पुर्जों को ऐसी-ऐसी जगहों में छिपाते थे कि आज बोलते या सोचते भी शर्म आ जाए। जाहिर है कि बात नकल करने की नहीं है। इस बार रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय ने नकल के 600 से ज्यादा नकल के मामले दर्ज किये। स्कूलों की बात करें तो 10वीं-12वीं परीक्षा के 45 विद्यार्थियों के नतीजे रद्द कर दिये गये। इन्हें जुलाई में होने वाली अवसर परीक्षा में शामिल होने का मौका भी नहीं दिया जाएगा। वहीं सरगुजा संभाग के एक स्कूल में 10वीं बोर्ड के 209 परीक्षार्थियों को गणित में शून्य दे दिया गया। इन सभी पर नकल करने का आरोप था। हालांकि, इन्हें पूरक की पात्रता होगी। यह सख्ती बहुतों को अच्छी लग सकती है। उन्हें लग सकता है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी और बच्चे स्कूल-कालेज को लेकर गंभीर होंगे। अब तक तो सारी कोशिशें केवल सरकार और पालक करते थे। सरकार जहां स्कूल खोलने, सुविधाएं जुटाने और टीचर उपलब्ध कराने में लगी हुई थी वहीं पालक भी अपनी अधिकतम क्षमता के अनुरूप बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने की कोशिश करते थे। परन्तु 70 फीसद बच्चों में अध्ययन की कोई जिजीविषा नहीं होती थी। पहले कालेज के बच्चे ही मस्तीखोर होते थे पर अब यह बीमारी स्कूलों तक जा पहुंची है। 9वीं-10वीं के बच्चे भी होटलों में बर्थडे पार्टी मनाते हैं। अब शिक्षकों का सब्र जवाब देने लगा है। पहले नकल पकडऩे पर भी यूएफएम केस नहीं बनाते थे पर अब ऐसा नहीं है। यह उनकी खीझ का ही परिणाम है कि इतने ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। अच्छा है, छत्तीसगढ़ में स्कूल कालेज तो बहुत खुल गए अब शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की भी कोशिशें होने लगी हैं।

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