-दीपक रंजन दास
दो दिन पहले की बात है. एक युवा कांग्रेसी से मुलाकात हो गई। उसके पिता एक कद्दावर कांग्रेसी नेता थे। इस नाते पुत्र से भी पहचान थी। बात घूम-फिर कर ऑपरेशन सिन्दूर और ऑल पार्टी डेलीगेशन तक भी पहुंची। पार्टी लाइन और निष्ठा पर अपना प्रवचन करने के बाद वह गांधी तक पहुंच गया। कहा कि अब कांग्रेस को गांधी से भी किनारा कर लेना चाहिए। वो आउटडेटेड हो गए हैं। अब युवाओं को कुछ नया चाहिए। दरअसल, यही वह मूल बीमारी है जो कांग्रेसियों को दिशाहीन बना रही है। कुछ बड़ा करने के चक्कर में पार्टी के नेता खुद अनाप-शनाप बक रहे हैं। या फिर हाथ-पर-हाथ धरे मुंगेरीलाल के सपने देख रहे हैं। गांधी की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि उन्होंने जन साधारण का विश्वास जीता था। उनकी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर आंदोलन खड़ा किया था। चाहे चरखा आंदोलन हो, चाहे नमक सत्याग्रह हो या फिर ग्रामीण वेशभूषा, गांधी एक गरीब भारतीय के रूप में उनके साथ खड़े थे। बड़े आंदोलन ऐसे ही खड़े होते हैं। ऐसे आंदोलन किसी एक व्यक्ति को हिरासत में लेने से खत्म नहीं होते। ऐसे नेताओं के समर्थक नहीं, अनुयायी होते हैं। गांधी का वह दौर ऐसा था कि दुनिया भर के शीर्ष नेता उनके आगे नतमस्तक थे। उनकी प्रेरणा से भूदान और गोदान जैसे यज्ञ चले, सीमांत गांधी पैदा हुए। गांधी ने सैकड़ों गांधियों को जन्म दिया। इनमें से कुछ ने अपने-अपने क्षेत्र में गांधी जैसी ही लोकप्रियता हासिल की। इसलिए गांधी कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते। जो ताकत तब गांधी के पास थी वही आज मोदी के पास है। मोदी की राजनीति समग्र की राजनीति है। उन्होंने कांग्रेस के पास न तो कोई मुद्दा छोड़ा और न ही कोई महापुरुष। शतायु कांग्रेस देखते-देखते अनाथ हो गई। ऐसी स्थिति में आत्मावलोकन करने की बजाय यदि कांग्रेसी भी भाजपाइयों की भाषा बोलने लगें तो समझ लेना चाहिए कि ताबूत में बस अब अंतिम कील ठोंकी जानी बाकी है। यहां मोदी और भाजपाइयों को अलग-अलग समझना होगा। मोदी कभी गांधी को कमतर नहीं आंकते। उनकी बातों में, उनके आचरण में गांधी के प्रति अटूट प्रेम और श्रद्धा ही दिखाई देती है। पर भाजपाई गांधी को कोसने का कोई मौका नहीं जाने देते। वे लोगों के मन में नफरत की उस आग को जिन्दा रखना चाहते हैं जो देश के विभाजन को लेकर भड़की थी। वो लोगों को बताते हैं कि गांधी चाहते तो विभाजन को रोक सकते थे। गांधी चाहते तो भगत सिंह की फांसी रुकवा सकते थे। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। इन आरोपों में सच्चाई चाहे लेशमात्र भी न हो पर लोग यही सुनना चाहते हैं और भाजपाई यही कहते हैं। अब अगर कांग्रेस के नेता भी ऐसी ही बातें करने लगें तो समझ लेना चाहिए कि कांग्रेस खत्म होने के कगार पर है। अंतिम कीलें खुद कांग्रेसी ठोंकेंगे। यही तो भाजपा का मिशन था – कांग्रेस मुक्त भारत।
Gustakhi Maaf: गांधी को भी छोड़ दिया तो फिर बचा क्या?




